Wednesday, 31 December 2025

10 आओ की ऐसे आदमी को ढूंढ़ते

आओ किसी ऐसे आदमी को खोजते हैं जिसने ना चक्की हो कभी हार
जिसने न मानी हो कभी हार
जो आगे ही बढ़ता रहा हो
और संतुष्ट हो अपनी जिंदगी से 

आओ किसी ऐसे आदमी को खोजते हैं
जो रहा हो हमेशा उजालों में
जिसने अंधेरा कभी देखा ही ना हो मुस्कुराते मुस्कुराते ही कटी हो जिंदगी
गम का इसके आसपास भी 
कोई साया ना हो 
आओ किसी ऐसे आदमी को ढूंढते हैं
अपने ही दम पर जिसने जी हो जिंदगी ईश्वर को जिसने पुकार ना हो किसी ऐसे आदमी को ढूंढते हैं

Wednesday, 24 December 2025

9 नई तस्वीरें

अच्छी बुरी सब यादें सुहानी हो जाएंगी,
नई तस्वीरें भी अच्छी लगेंगी जब पुरानी हो जाएंगी।
​जो आज चुभ रहे हैं काँटों की तरह यादों में,
वक्त की धूल पड़ते ही वो सब कहानी हो जाएंगी।
शिकवे-शिकायतें जो आज दिल पर भारी हैं,
कल वही बातें आँखों का पानी हो जाएंगी।
​मुसाफिर हैं हम सब इस चलते हुए जीवन के,
हर मुश्किल राह भी कल एक निशानी हो जाएगी।
सुन लिया करो बुजुर्गों की
कल उनकी भी बातें बहुत रूहानी हो जाएंगी।
​मत कर मलाल तू आज के बिखरे हुए पन्नों का,
ये अधूरी दास्तान ही कल तेरी ज़िंदगानी हो जाएगी।
अच्छी बुरी सब यादें सुहानी हो जाएंगी,
नई तस्वीरें भी अच्छी लगेंगी जब पुरानी हो जाएंगी।

Friday, 17 October 2025

7 आसान नहीं हैँ ऊंचे नीचे रास्तों पर 181025

आसान नहीं हैँ ऊंचे नीचे रास्तों पर चलना
ऊँच-नीच का सामना करना  पड़ता  हैँ 
मंजिल सामने दिखती हैँ फिर भी रास्ता बदलना पड़ता हैँ 
जीने नहीं देते लोग सीधी साधी जिंदगी धीरे धीरे यंहा खुद को बदलना पड़ता हैँ 

आसान नहीं हैँ ऊंचे नीचे रास्तों पर चलना
टेढ़े मेढे राश्तों पर चलना 
जब पहचानने लगती हैँ दीवारें तो घर बदलना पड़ता हैँ 
कामयाबी की चाह में कट जाती हैं जढ़ें
जब शहर बदलना पड़ता है

आसान नहीं हैँ ऊंचे नीचे रास्तों पर चलना
टेढ़े मेढे राश्तों पर चलना 
हर दिन, हर पल जाने कौन गिरा दे आपको भीड़ में चलने के लिए यहाँ संघर्ष करना पड़ता है थके हारे चलना पड़ता है।





Monday, 29 September 2025

8 दोहरी जिंदगी

कभी कभी लागता है ऐसे 
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी 
कहाँ गई मेरी जिंदगी 
क्या सब जी रहे हैं 
दोहरी जिंदगी 
जी रहा हुँ पिता की जिंदगी 
जी रहा हुँ पति की जंदगी 
कहा है मेरी जिंदगी 
कभी कभी लगता है ऐसे 
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी 
हत्या कर दि मैंने कुछ किरदारों की 
वक्त ने कुछ को मार दिया 
​सुबह उठूँ तो फर्ज पुकारे,
शाम ढले तो जिम्मेदारी।
हर साँस में कर्तव्य भरा है,
खुद के लिए न कोई तैयारी।
​कभी कभी लगता है ऐसे
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी
क्या सभी जीते हैं 
दोहरी जिंदगी 

Friday, 5 September 2025

5. खिड़की अपने आप में एक मुकम्मल जहाँ होती है

खिड़की अपने आप में 
एक मुकम्मल जहाँ होती है 
दूकानदार दिन भर बैठे रहते है 
ग्राहक की चाह में 
और बूढ़ी आंखे भी टिकी रहती हैं 
खिड़की पर बाट देखते हुऐ 
बचपन गुजर जाता है 
खिड़की पर लटकते हुऐ 

खिड़की अपने आप में 
एक मुकम्मल जहाँ होती है 
खिड़की से ही मिलती सारी सहूलियतें 
खाने की चीजें, पीने की चीजें, टिकट सिनेमा हॉल की
खिड़की से ही देखा था मैंने उसको 
और खिड़की पर ही छोड़ दिया 

खिड़की अपने आप में 
एक मुकम्मल जहाँ होती है 
अब तो सबके हाथों में हैं
अपनी अपनी खिड़कियां 
और झाँकते रहते है पूरी दुनियां में 
एक दूसरे की दुनिया में 




6. सफर में

सफर में दिखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ 
सब खोये हैं अपनी ही दुनिया में
खिड़की के बाहर से  नजारे चीख चीखकर बुला रहे हैं इन्हे 
कुछ सोये हुऐ हैं गहरी नींद में 
सफर में दीखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ 
बेलगाड़ी भी दिख जाती हैं अभी सन 2025 में
और दिख जाते हैं कुछ खेत लहराते हुऐ भी 
पर सफर में दीखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ 

गुम हैं सब अपने ही मोबाइल की दुनिया में,

बाहर का नज़ारा, अब किसको भाता है?

दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।

​वो हरी-भरी वादियाँ, वो उड़ते पंछी,

बस चलती है ट्रेन और गुज़रती है ज़िंदगी।

दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।



Tuesday, 2 September 2025

4. माटी

​माटी मुझमें मैं माटी में खो जाता हूँ,
माटी मेरी मैं माटी का हो जाता हूँ।
आकार बदलता हूँ,
विचार बदलता हूँ,
मैं माटी के रंग बदलता हूँ,
मैं माटी के संग बदलता हूँ।
खुशबू लेता हूँ माटी की,
माटी को खुशबू देता हूँ,
माटी मेरी मैं माटी का हो जाता हूँ।

​कभी छुप जाता हूँ मैं माटी में,
कभी माटी से पहचान बनता हूँ,
माटी को शान बनता हूँ,
माटी को जान बनता हूँ,
माटी मेरी मैं माटी का हो जाता हूँ

कभी बारिश की बूँदें बनकर 
कभी नया बीज बनकर 
मैं अंकुरित हो जाता हूँ 
एक नया जीवन पाता हूँ
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ

कभी धूप की तपिश में जलकर,
कभी हवा के संग बहकर,
हर कण में समा जाता हूँ,
हर रूप में नया जीवन पाता हूँ,
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ।

कभी एक वृक्ष की जड़ बनकर,
कभी फलों का स्वाद बनकर,
जीवन का सार बन जाता हूँ,
माटी को हर बार पूजता हूँ,
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ।
हाँ, मैं इंसान हूँ माटी का,

और मेरी पहचान है माटी से,
मैं जीता हूँ माटी में,
और अंत में माटी में मिल जाता हूँ,
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ।

मेरी उंगलियों के पोरों में, माटी ख़्वाब बुनती है,
मैं मौन रहता हूँ, पर माटी सब कुछ सुनती है।
मैं इसे सिर्फ सानता नहीं, इसमें रूह भरता हूँ,
पुरानी जड़ों से जुड़कर, नए प्रयोग करता हूँ।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​कभी टेढ़े-मेढ़े कोनों में आधुनिकता तलाशता हूँ,
कभी मिट्टी के सीने पर भविष्य को तराशता हूँ।
मेरे औज़ार जब मिट्टी को सहलाते हैं,
कंक्रीट के जंगलों में भी, नए अक्स उभर आते हैं।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​वो जो कहते हैं कि मिट्टी पुरानी बात है,
उन्हें क्या पता, इसमें हर युग की नई शुरुआत है।
मैं अमूर्त (Abstract) को आकार देता हूँ,
मिट्टी के बिखराव को एक विचार देता हूँ।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​कभी इसे आग में तपाकर 'टेराकोटा' सा सख़्त करता हूँ,
कभी इसके कच्चेपन में ही अपना सारा वक़्त भरता हूँ।
मेरी प्रदर्शनी में सजी मूर्तियाँ, सिर्फ मिट्टी का ढेर नहीं,
मेरी आत्मा के टुकड़े हैं, इनमें कोई फेर नहीं।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​मैं कलाकार हूँ, मैं परिवर्तन का राही हूँ,
माटी की इस आधुनिक गाथा का मैं ही गवाही हूँ।
मैं रूप बदलता हूँ, मैं काल बदलता हूँ,
मैं माटी के संग, खुद को हर पल बदलता हूँ।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।

3. आपके आने की खुशी

आपके आने की खुशी में घर महक उठा,
जैसे वीराने में कोई फूल खिल उठा।
अंधेरी रातों में चाँदनी बिखर गई,
पतझड़ में जैसे बहार आ गई।
हर कोना खुशी से झूम उठा,
हर दीवार पर रौनक आ गई।
जैसे पूजा की थाली में दीप जल उठा,
आपके आने की खुशी में घर महक उठा।

अब सूनापन कहीं नहीं ठहरता,
हर तरफ बस आपका ही जिक्र है।
इस दिल में भी एक रोशनी हुई,
किसी का अब कोई नहीं डर है।
आपके कदम पड़े तो साँसों में इत्र घ

Monday, 1 September 2025

2. ​ये जो रास्ते हैं

​ये जो रास्ते हैं,
इन पर कभी हम अकेले चले थे।
धूप थी, छाँव थी,
हर कदम एक नया जज्बा था।
​उम्मीदें थी कुछ,
कुछ सपने थे टूटे।
उलझनें थी बहुत,
कुछ अपने थे छूटे।
​उन काँटों से मिले,
जो राहों में बिछे थे।
पर उन्हीं से सीखकर,
हम कुछ तो आगे बढ़े थे।
​आज जब पीछे मुड़कर देखा,
वही रस्ते याद आए।
जिन पर हम गिरे थे,
और फिर से उठकर चले थे।
​यकीन ही नहीं होता,
वही धूल, वही राह।
कब हमारे लिए
चंदन बन गई,
कब इस दिल को
शांति दे गई।

1. वजह तुम्हे चाहने की

ऐ फूल जो मेरे 
जीवन को महका रहे हैं
तुम ही हो वजह इन्हे चाहने की 

ऐ हवा के झोंके जो मेरे 
मेरे बालों को सहला रहे हैं 
तुम ही हो वजह इन्हे चाहने की 

ऐ बारिश की खुशबू और मिट्टी के रंग 
जो मुझे भा रहे हैं 
तुम ही हो वजह इन्हे चाहने की 

ऐ धूप की किरणें जो मुझ पर
मेरे चेहरे पर हँसी ला रहे हैं
तुम ही हो वजह इन्हें चाहने की

​ऐ रात, ऐ चाँदनी जो मेरे
मेरे ख्वाबों को सजा रहे हैं 
तुम ही हो वजह इसे चाहने की

​ऐ चाँद, तारे जो मेरे
रास्तों को दिखा रहे हैं
तुम ही हो वजह इन्हें चाहने की

​ऐ मीठी सी मुस्कान जो मेरे
मेरे होंठों पर ठहरी है 
और हटती ही नहीं 
तुम ही हो वजह इसे चाहने की





Friday, 29 August 2025

सफर की धूल

एक सफर है जिंदगी  
और हम राहगीर 
चल रहे हैं 
धूप में भी कभी छाँव में 
दिन में भी कभी रात मे
फान रहे हैं सफर की धूल 

एक सफर है जिंदगी  
और हम राहगीर 
ऊँचे भी हैं रास्ते कुछ निचे भी 
टेढ़े भी है रास्ते कुछ सीधे भी 
ना चाहते हुऐ भी 
चल रहे हैं और
फांक रहे हैं सफर की धूल 

इन्ही राश्तों पर चले थे वे लोग 
फूलों पर भी चले थे 
और काँटों पर भी चले थे
जो बना गए रास्ते हमारे लिए 
जाने कब सफऱ की धूल 
चन्दन बन गई 
सबको कहाँ नसीब है 
सफर की धूल 







Friday, 22 August 2025

सफर की धुल ( चन्दन बन गई )

सफ़र की धूल (चंदन बन गई)

​तुलसी राम जी द्वारा रचित, 'सफ़र की धूल (चंदन बन गई)' एक ऐसा काव्य संग्रह है जो हमें जीवन की यथार्थवादी और भावुक यात्रा पर ले जाता है। यह किताब हमें बताती है कि कैसे जीवन के उतार-चढ़ाव, संघर्ष, और कड़वे अनुभव हमें अंत में एक बेहतर और परिपक्व इंसान बनाते हैं। लेखक ने अपनी कविताओं में यह दर्शाया है कि जिस तरह धूल भरे रास्ते पर चलते हुए हम थक जाते हैं, उसी तरह जीवन की कठिनाइयां भी हमें थका देती हैं, लेकिन अगर हम धैर्य रखें और आगे बढ़ते रहें, तो वही संघर्ष हमारे व्यक्तित्व को निखारता है और हमें चंदन की तरह सुगंधित बना देता है। यह संग्रह सिर्फ़ व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्यार और रिश्तों की जटिलताओं को भी गहराई से छूता है। यह बताता है कि रिश्ते कितने नाज़ुक होते हैं और उन्हें कैसे संभालना चाहिए। साथ ही, यह संग्रह समाज में हो रहे बदलावों, मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट, और आधुनिकता की अंधी दौड़ पर भी एक तीखी टिप्पणी करता है। कुल मिलाकर, तुलसी राम जी की यह किताब हमें जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती है और सिखाती है कि हर मुश्किल के बाद मिलने वाला अनुभव हमें और मज़बूत बनाता है, ठीक वैसे ही जैसे धूल का सफ़र चंदन में बदल जाता है।

खंजर में जहर लगाकर मारना

खंजर में जहर लगाकर मारना

कहीं मैं जिंदा ना रह जाऊं 

हर शख्स को हक है मुझे मारने का

हर कातिल को ये समझा दो 

कहीं मैं जिंदा ना रह जाऊं 

अगर हो सका सांसों को रोक लूंगा मैं 

कहीं जिंदा ना रह जाऊं 

जला दो मेरे अरमानों को 

हर ख्वाहिश को दफना दो 

कहीं किसी आरजू के लिए 

मैं जिन्दा ना रह  जाऊं 

जाने कहां है वो खोई-खोई

जाने कहां है वो खोई-खोई 
जिसकी आंखों में अधूरा सपना है कोई सपनों से डर सा लगता है फिर भी सपनों में है खोई 
रहती है वह घर में लेकिन जाने कहां है खोई 
जिसकी मुस्कान को है अखियां तरसी जिसकी अंखियां अश्कों से बरसी 
लगता है जैसी यह रोई-रोई 
जाने कहां है खोई खोई 
कर दूँ इसका हर सपना पूरा 
ना रहे कोई, ख्वाब अधूरा 
मेरे मन की उदासी जाए 
होठों पर इसकी मुस्कान जो आए 
आरजू है मेरी यहीं इस को दुख ना आए कोई फिर ना रहे ये कभी खोई-खोई 

खुश रहने की आदत

खुश रहने की आदत यूं ही नहीं है हमें मैंने इसकी गम के आंसुओं से कीमत चुकाई है बदनाम हुआ हर पत्थर आकर मुझे लगा हर पत्थर से ठोकर खाई है आशिक के नाम से मशहूर आज ये शोहरत मैंने यूं ही ना पाई है खुश रहने की आदत यूं ही नहीं है इसकी गम के आंसुओं से कीमत चुकाई है  तुमसे जुदा होकर कितनी बार मौत को गले लगाया है जाने क्यों मौत से बड़ी है ये जुदाई है खुश रहने की आदत यूं ही हहज नहीं है हमें इसकी गम के आंसू मत चुकाए हैं

हालात को दोष दूँ या इस जिंदगी को

हालात को दोष दूँ या इस जिंदगी को 
हालात जो मैंने खुद पैदा किये है 
या जिंदगी जो किसी की नहीं होती 
ठुकरा दूं उन्हें या स्वीकार लूं बंदगी को बंदगी उसकी जिसने देकर भी मेरा ना छोड़ा इस जिंदगी को अब तू ही बता हालात को दोस्त हालात का नाम दूं इस जिंदगी को

Thursday, 21 August 2025

है तिनके की भी अहमियत

है तिनके की भी अहमियत इस जहाँ में वीरान हो जाती हैँ शाख जब पत्ते झड जाते हैँ 
कौन पूछता है पिंजरे में बंद पंछीयों को याद तो वो आते हैँ जो उड़ जाते हैँ 

कया कभी सोचा है तुमने

क्या कभी सोचा है तुमने 

सोचता हूं कभी-कभी चहेकते हैं पंछी

या कोई राग सिखाते हैं 

हम क्यों नहीं समझ पाते इनको 

 इस छत से उस छत उड़ते फिरते हैं 

इनकी सुबह कितनी सुंदर होती है 

भोर का सूरज भी देखो कितना सुंदर होता है 

मुस्कुरा रहा हो जैसे 

बादल भी रंग बदलते हैं 

हमारी नजरों पर जाने कैसी धुंध सी छाई है

 जो हटती नहीं हम कितना अनदेखा करते हैं 

सुबह कितनी सुंदर होती है 

ऐसे समझ ना पाओगे इनको 

सुनने समझने से पहले खुद से बातें करते फिर सुनते हैं पंछीयों का चहकना 

सूरज से बातें करते हैं  

प्रकृति हर सुबह क्लास लेती है 

पर बहुत  लोग बंक पर होते हैं

यह कक्षा कितनी सुंदर होती है 

सुबह कितनी सुंदर होती है 

जितना देखो उतनी सुंदर होती है 

पहरन और उतरन में फर्क होता है

धोने से भी नहीं निकलते कुछ दाग 
पहरन और उतरन में फर्क होता है 
आंखें बंद करने से रात नहीं होती 
अंधेर और अंधेरे में फर्क होता है 
चेहरे पर लगा लो कितने भी नकाब  
नजरे झुकाने और अदब में फर्क होता है आंखों की नामी बता देगी कितना भुलाया है 
याद करने और यादों में फर्क होता है बेवजह लड़ते-लड़ते जिंदगी बीत जाती है जीने में और जिंदा रहने में फर्क होता है माना दुनिया विश्वास पर कायम है 
पर सच में और सच्चाई में फर्क होता है जाने क्या हुआ है जमाने को 
कहने और सुनने में फर्क होता है 
धोने से भी नहीं निकलता कुछ दाग पहरन और उतरन में फर्क होता है 

बेजान शाख से पत्ते गिर जाते हैं

बेजान शाख से पत्ते गिर जाते हैं 
जड़ें हो कामजोर तो पेड़ भी गिर जाते हैं खाली हाथ कप-कपाते पैरो पर भी 
संभाले रखा हमने तो अपने आप को
जाने कैसे लोगों के जमीर गिर जाते हैं अपनी कीमत लेकर ही सुखते हैं 
सच्ची आंखों से जब आंसू गिर जाते हैं 
उम्र गुजर जाती है पहचान बनाने में 
ठोकर खाकर भी संभल जाते हैं 
कभी नहीं उठते वो जो नजरों से गिर जाते हैं

चाह कर भी छूता नहीं हूं फूलों को

चाह कर भी छूता नहीं हूं फूलों को 
रंग कोई लगाता नहीं हूं 
मैंने देखा है छुईमुई को शरमाते हुए 
छू लूं तो गुनाह हो जाए 
खुबसूरती की क्या बात करें 
कहां से इतने गुलाब लाएं वह सजता सवारता इतना है 
हम आईना हो जाए तो गुना हो जाए जिसने भी देखो जमाने की बात करता है शहर न देखा,  घर न देखा, 
हर आंगन में रोशनी 
हर छत पर चांद है 
अपनी ही बात हो तो गुनाह हो जाए 
मैंने सुना है उसने आंचल में छुपा रखे हैँ सितारे
 सितारों का अपना ही नूर है 
ऐसे में आंखें भी बंद कर लूं तो गुनाह हो जाए

शराब

मेरा वजूद कुछ नहीं 
मेरी शक्शियत कुछ नहीं
फिर भी झुकता है जहां मेरे कदमों में 
मिट गए मेरे साथ रहने वाले 
मुझे हम कदम कहने वालों के कदम अब कदम ना रहे 
जो आग थे कभी बुरा हो गए
लाखों में रहने वाले खाक हो गए 
दुनिया कितनी भी सफाई दे 
दुनिया कितनी भी दुहाई दे 
फिर भी खराब हुं मैं 
शराब हुं मैं 
जी हाँ शराब हुं मैं

11. इमारतें देख कर सजदा करते हो

इमारतें देख कर सजदा करते हो,
चलते-फिरते इंसान तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
रंग के अलावा तुम्हें कुछ और दिखता क्यों नहीं?
रोना-धोना, चीखना-चिल्लाना,
हँसते-मुस्कुराते चेहरे तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
​पत्थरों की चमक पर जान देते हो,
अंदर के अंधेरे तुम्हें दिखते क्यों नहीं?

महंगे लिबासों की बात करते हो,
बदन के ये जख्म तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
अपनी अपनी दीवारें ऊँची कर लीं,
गिरती हुई दीवारें तुम्हें दिखती क्यों नहीं?

दूसरों के आँसुओं को पानी समझते हो,
अपनी आँखों के जाले तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
​दुनिया को बदलने की बात करते हो,
खुद के ये बदलते रूप तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
इमारतों के शौकीन हो, ठीक है,
मगर उजड़ते हुए घर तुम्हें दिखते क्यों नहीं?

दुआओं में असर होता है

आंखों में खुशी
दिल में बहार क्यों है 
आज पता चला यार 
दुआओं में असर होता है
 
फूल खिले हैं चारों ओर 
हवाओं में महक सी क्यों है
आज पता चला यार 
दुआओं में असर होता है

जैसी आज है सुबह 
ऐसी तो कभी होती न थी
प्रफुल्लित है मन 
आज पता चला यार 
दुआओं में असर होता है

दुआओं एवम शुभकामनाओं के लिए 
सभी का हार्दिक धन्यवाद
(सीमा संग तुलसी राम) 

ए खुदा तेरी रौशनी से घर नही जलते

ए खुदा तेरी रौशनी से घर नही जलते
फिर क्यों तेरे बन्दे हाथों में राख लिये फिरते हैं
वक्त कभी रहता नही एकसा
आसमा में चमकते हैं जो तारे
अखिर तो जमी पर गिरते हैं
फिर क्यों तेरे बन्दे *ज़मीं* पर लड़ते फिरते हैं

आया ही नही जीने का सलिका
गलती किससे कहां क्या हो गई
यही गिनाया करते है
क्यों तेरे बन्दे एसा करते है
ए खुदा तेरी रौशनी से घर नही जलते
फिर क्यों तेरे बन्दे हाथों में राख लिये फिरते हैं

इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे

इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
कुदरत में भी नही ये इतने रंग बदलते हैं
ये कितने डंग बदलते हैं
जाने कब अकेले रह जाऔ ये पल में संग बदलते हैं

इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
ये कितने डंग बदलते हैं
ये कितने रंग बदलते हैं

इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
कभी न सोचा होगा किसी ने
बोलो क्या बाकी रह गया
अब तो अंग बदलते हैं

इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
ये कितने रंग बदलते हैं
ये कितने डंग  बदलते हैं

परियां

सचमुच की परियों के पंख नही होते
पर एसे ही हस्ती है दिल को छू जाती हैं
स्वपन की दुनिया का एहसास कराती हैं
सचमुच की परियों के पंख नही होते 
पर एसी हि होती हैं

जब तेरी तस्वीर बनाऊगा मैं
तो शायद पंख लगाऊंगा मैं
दूर हि रहती है और खुब सताती हैं

जब तेरी तशवीर बनाऊंगा में तो शायद पंख लगाऊंगा

मां मुझे दुनिया में आने दो

मां मुझे दुनिया में आने दो

सताऊंगी न कभी 
रोना भी भूल जाऊंगी 
गलती नहीं की है तूने
मुझे जिंदगी  मे लाकर 
में तेरा सहारा बनूगी 
मां मुझे दुनिया में आने दो

अश्क पोंछुगी तेरे में 
तुझे तन्हा न रहने दूंगी 
नाम करूंगी दुनिया में तेरा 
बोझ न रहूंगी कभी
बेमाइने बह रही है जिंदगी 
में उसका किनारा बनूंगी 
मां में तेरा सहारा बनूगी 
मां मुझे दुनिया में आने दो

अलग न कर मुझे 
में नही तो तू भी नही
मेरी जीत में ही तेरी जीत है 
मत मार खुद को 
में तेरा ही हिस्सा हूं 
मां में तेरा सहारा बनूगी 
मां मुझे दुनिया में आने दो


कहने को तो तन्हा है पर हैं नही

घिरे हैं अपने ही ताने बानों में
कहने को तो तन्हां हैं पर हैं नही

वो बातें भी किसी ओर की करते है
घिरे हैं भीड़ में अपने पर  हैं नही

रात गुजार दी मियां
थोड़ा सा और खोज लो
शायद कुछ मिल जाये वहम है

कुछ है नही

उड़ना सिख रहे हैं

हवाओं से कह दो अपनी ओकात मैं रहें
हमारे चिराग अब तूफान मैं जलना सीख रहे हैं

आसमान से कह दो अपना कद और ऊँचा कर ले
हमारे पंछी अब उड़ना सीख रहे हैं

उन चाँद सितारों से भी कह दो बढ़ा लें रौशनी अपनी 

हमारे तारे भी अब चमकना सीख  रहे हैं

ओंधे मुह गिरोगे अब तो सरहद पर दुसमन से कह दो
मेरे देश के बच्चे तिरंगे को लहराना सीख रहे हैं

लिखने को हो जाएँ तैयार कलमकारों से कह दो
हजारों हाथ दुनिया को मुट्टी में भरना सीख रहे हैं

शिक्षा तभी होगी ये साक्षर जाकर हर नजर से कह दो हम माँ,

 बहन और बेटी की इज्जत करना सीख रहे हैं

कवि - तुलसी राम प्रजापति



Kahani MEWAT KI

ये कहानी मेवात के एक छोटे से गांव नीमका से सुरु होती है
गांव का नाम ही नीमका था वहां नीम के पेड़ कम ही होंगे  कीकर थी चारों ओर ये कीकर भी बहुत सुंदर लगती थी हरि भरी इससे ज्यादा हरयाली कभी देखी भी न थी गांव के बाहर ही एक स्कूल था  हम स्कूल तख्ती, सलेटी ओर स्याही लेकर जाते थे कभी कभी
सरकण्डे की कलम बनाते थे
बहुत मजा आता था स्कूल बंक करने में
ठीक्कर (मट्के का छोटा सा टुकडा) से फिरक्नी बनाते थे दीवारों पर घिस घिस कर।।

गांव का माहौल कुछ ऐसा हो गया कि
फिर हम शहर आ गये मुझे ऐसा लगता है जब तक गांव में हम थे वो गांव तभी तक सुंदर था  हमारे शहर आने के बाद गांव जैसे उजाड़ सा  हो गया
हरे भरे कीकर के पेड़ भी जैसे सूख ही गये


मेरे दादा जी का आस पास तो क्या दूर तक नाम था उनका नाम था ग्यासी राम प्रजापति 

मेरे पिताजी जी वे ज्यादा पढ़े लिखें नहीं थे पर उन्होंने अपने जीवन में चुनौतीयों का सामना किया आजकल हम कॉलेज एवम अन्य संस्थानों से कसम सीखते है उन्होंने अपने जीवन में जो भी कार्य किये अपने अनुभव से किये उन्होंने जीवन यापन के लिए जो कार्य किये सबसे पहला काम जो उन्हें आसान लगा ठंडी कुल्फीयां बेचने का काम किया, और स्वम ही कुल्फीयां खाकर बीमार हो गए और वह काम छोड़ दिया, फिर अपने कुछ मित्रों के साथ दिल्ली आये और कपडे सिलने का काम किया, इस काम में भी उनका मन नहीं लगा तो, फरीदाबाद आकर रिक्शा चलाया इस काम से भी वे जल्दी समझ गए कुछ होने वाला नहीं है उनके सपने बड़े थे पर रास्ते का पता नहीं था फिर अपने गांव आकर अपने पिताजी जी के साथ मिलकर मिट्टी के बर्तन बनाने सुरु किये पर गांव में उन बर्तनो का सही भाव नहीं मिलता था तो इन्होने लकड़ी के समान बनाने सुरु किये जैसे बेलन, मूसल, लट्टू, हुक्का, आदि लकड़ी से बनाये गए समान को बहुत पसंद किया गया, कई साल यही काम किया!

 गांव से हम बच्चों का भविष्य सुधारने पिताजी जी शहर आ गए क्योंकि हमारे गांव में अब डकैत पैदा हो रहे थे लोग नोकरी ओर खेती बाड़ी में कम ओर डकैती में ज्यादा थे शहर आकर पापा जी ने कच्ची मिट्टी का छान वाला  घर बनाया और मिट्टी के बरतन बनाने का काम किया 

डायरी


डायरी में एक कोरा पन्ना  छोड देना
वक्त लिख देगा दास्ताँ तेरी मेरी

सुरु किया है जो सफ़र राह में ना छोड देना
नही आता मुझे एक खुबसूरत मोड देकर छोड देना

दूर ही रहना भाता नही मुझे तेरा मायूस होना
और करीब ले आता है तेरा नज़र अंदाज़ कर देना

पुछे जो कोई मुझसे
इबादत की तरह मैं तुम्हे क्यों चाहता हुँ
यूँ खुदा का सुक्र अदा करना चाहता हूँ

थोडा वक्त दो, कुछ बाते करो
कुछ मै सुनू कुछ मेरी सुनो
जितना तुम जानोगे मुझको
उतना करीब आओगे

सोचा न था कोई ऐसे भी जिन्दगी में आयेगा जिसके दूर जाने से आँखे नम ओर दिल वीरान हो जायेगा

क्यूँ बेकरार है उसके लिये
जिसे तेरे करार से कोई सरोकार नही
नफरत जगह बना लेती है 
जहां ऐतबार नही
कल का क्या
जी ले इस पल को
कल किसी को तुमसे प्यार हो न हो

।।जब प्यार हो जिन्दगी में तो मिट्टी से खुस्बू आती है रन्ज में तो फूल भी महकना छोड देते है ।।

Reasons why you should NEVER marry an Artist:
1. They are moody like a pregnant woman.
2. They are super boring. They can spend whole day just looking at a leaf.
3. You can’t beat them in surprises. They are more creative than you can imagine.
4. They may look simple but their head is as complex as rocket science.
5. If you are a clean freak, be ready for divorce.
6. They are man/woman of few words. 2/3rd of their life, they remain silent.
7. They stay in their own imaginary world, hard to bring back to normal world. 
8. You can’t seduce them easily; they know anatomy better than you.
9. They spent half of their life in the studio.
10. If they are dedicated artist, you will be their second love. First is ART

चांद को मुट्ठी में भरना है
सोच लिया है तो छु भी लेंगे
अब आस्माँ दूर नही मेरे पैरों से

तुमसे मिलकर करना हह्ता हुँ बहुत सी बाते पर मुझे यकिन है जब कभी मिलोगी तो कहने को कुछ न होगा बस तुम्हे नीहारेंगी मेरी आँखे और बुझा लेंगी अपनी बर्षों की प्यास मेरी बात तुम तक पहुंच जायेगी *जाना* खामोश रहकर भी।

Tuesday, 19 August 2025

दिल के जवाँ रखने से

दिल के जवाँ रखने से तक्दीरें बदल जाती हैं
दोस्त हो साथ में तो तस्वीरें बदल जाती हैं

हर पल जियो ओर ऐसे जियो के पल आखरी है
जाने ना दो बचपन को  खिल्खिलओ, बच्चे हो जाओ
मुस्कुराने से भी हाथों की लकीरें बदल जाती है

ज़िंदादिल रहो, बिखेर दो खुशियां दोनो हाथों से
रोते बिलख्ते होटों पर मुस्कान जब आती है
सच कहता हुँ खुदा के भी फैसले बदल जाती है

प्यार में डूबे खत

खीच लाती थी जो तेरी ओर
वो रूहानी सी खुशबू आज भी है
तेरे दिये हुए स्कार्फ में
काजल को स्याही बनाकर
लिखे होंगे उसने वो खत
जब भी पढता हुँ कुछ नया ही पाता हुँ
प्यार में डूबे खत कभी पुराने नही होते

बन्द आंखों से भी महसूस कर लेता हूँ
तेरे पास होने के अहसास को
सदियों से फूल ही है प्यार की निशानी
फ्रेम वही रहता है तस्वीरें बदल जाती हैं
महोब्बत में तोहफे कभी पुराने नही होते

तुमसे हूँ, तुम्हरा ही रहूँगा सदा
जब जी चाहे आजमा लेना
ऊम्र की आंच पर रिस्तों को सेक लो
बिना विशवास के रिश्ते श्याने नही होते
जब भी पढता हुँ कुछ नया ही पाता हुँ
प्यार में डूबे खत कभी पुराने नही होते

गीत, गजल सब फीके लगते हैँ 
चाहो तो मुहोब्बत शब्द हटा कर देख लो
कुछ भी लिख लो, कैसे भी लिख लो
बिना प्यार के मिश्रे सुहाने नही होते
जब भी पढता हुँ कुछ नया ही पाता हुँ
प्यार में दुबे खत कभी पुराने नही होते

ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ

सर झुकाता हूँ  सजदे में
खुद पर गुमान करता हूँ
अदब से हर काम करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ

चल रहा हूँ मशाल लेकर
चिरागों को रौशन करने का काम करता हूँ
मुझे कोई पहचानता नही पर
हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ

बनाता हूँ रास्ते नये पर
नक्शेकदमों पर उनके ही चलता हूँ
जिसमे धूल है उनके चरणों की
उस मिट्टी को नमन करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ

हार न माने कभी भी जिन्दगी में
जीने का हुनर सिखाता हूँ
देखता रहूँ मैं रोज़ आईना
ऐसे काम करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ

जब कभी आप हमे याद आओगे

जब कभी आप हमे याद आओगे
थोडा सा तो आप भी मुस्कुराओगे
मन ही मन व्याकुल से हो जाओगे

महफिल में होगी कभी जब चर्चा
कभी खुशी के गीत गाएंगे
तन्हाई करेगी जब पागल
तो आप हमे याद आओगे

रौशन किये हैं दिये आपने
बहुत से दीप जलाए
जगमग होगा जहान जिस दिन
तो आप हमे याद आओगे

फूलों के साथ होते हैं कांटे
दिये के साथ अन्धेरा होता है
लहरों के साथ टकराके
डगमगायेगी जब कस्ती हमारी
तो आप हमे याद आओगे

जब कभी आप हमे याद आओगे
थोडा सा तो आप भी मुस्कुराओगे

ना हो सिक्वा किसी से किसी को
ऐसा मुमकिन नही
हमे भी है
आपके पंखो से उड़ेगा जब कोई
तो आप हमें याद आओगे

जब कभी आप हमे याद आओगे
थोडा सा तो आप भी मुस्कुराओगे











तेरी हर अदा पर कविता बन जाये

कहना है बहुत कुछ
कैसे कहुँ *जाना*
कैसे मैं  तारीफ करुँ
तुम हो मेरी कल्पना
तुम सुबह हो, तुम शाम हो
तेरी कितनी तारीफ करुँ
मैं कवि तू कविता बन जाये
तेरी हर बात पर कविता बन जाये

इनायत बहुत है तेरे पास
पर तू जानता नही
तू मेरे चहरे का नूर है
तू मेरा गुरुर है
तेरी कितनी मैं तारीफ करुँ
मैं कवि तू कविता बन जाये
CCC

जिन्दा हुँ मैं तू मेरी रूह है
जुदा ना होना कभी
जिन्दा हो, जिन्दा ही रहना
वाज़िब है उनका पागल कहना
वो इतना ही जानते हैं
पर तेरी मैं तारीफ करुँ
कि मैं कवि तू कविता बन जाये
तेरी हर बात पर कविता बन जाये









कहानी पत्ते की (किसी डाल का पत्ता था)

किसी डाल का पत्ता था
मैं टूटने से पहले
अब जमीं का हो गया हूँ

मैं मिटा नहीं हूँ टूट कर
हर साख का हो गया हूँ
ले गया हवा का एक झोंका
मुझे मेरे घर से उड़ा के
अब मैं जहाँ का हो गया हूँ

मिट्टी का एक टुकड़ा था मैं
कुछ बनने से पहले
अब विचार किसी कलाकार
का हो गया हूँ

न था मैं परिंदा आस्मा का
पर खूब उड़ा
मिटती नहीं है हस्ती
किसी का होने से
पा लिया है अपने आप को
अब खुद का हो गया हूँ

सफ़र है जिंदगी मुसाफिर हैं हम सब
चलते चलते अब मैं राह सा हो गया हूँ
चैन से सो जाओ अब तो यारो
अब मैं तुम सा हो गया हूँ

मुस्कुराते रहना

मायूसी भागेगी धूप नही लगने दूँगा
सुबह से थोडी छांव उधारी हि सही
सांझ तक बस मुस्कुराते रहना

नादान हुँ मैं नादनियां करता हुँ
माफ करके मेरी नादानीयों पर
ठहाके लगाते रहना

मंज़िल की ओर चले है अभी तो
रोकेंगे लोग तुम्हे रुकना ना बढ़ते रहना
लोग चाहें जैसा चश्में वैसे ही
लगाते रहना


Saturday, 16 August 2025

वक्त बदल जाते हैँ

वक़्त बदल जाते हैँ हालत बदल जाते हैँ 
ज्यादा शिकायतें न किया करो 
कहने सुनने में ही जज्बात बदल जाते हैँ 
 
होती नहीं खबर पर लोग बदल जाते हैँ
तुम मिट्टी के घरौंदों की बात करते हो 
बदलाव जब आता है तो आसमान बदल जाते हैँ

Thursday, 14 August 2025

ऐसे मैं शहीदों का सम्मान करता हूँ

सर झुकता हूं सजदे में 

अदब से हर काम करता 

ऐसे मैं शहीदों का सम्मान करता हूँ

चल रहा हूँ मशाल लेकर

चिरागों को रौशन करने का काम करता हूँ
शहादत की  उनको याद दिलाया करता हूं
ऐसे मैं शहीदों का  सम्मान करता हूँ

बनाता हूँ रास्ते नये पर
नक्शेकदमों पर उनके ही चलता हूँ
जिसमे धूल है उनके चरणों की
उस मिट्टी को नमन करता हूँ
ऐसे मैं अपने शहीदों  सम्मान करता हूँ

हार न माने कभी भी जिन्दगी में
जीने का हुनर सिखाता हूँ
देखता रहूँ मैं रोज़ आइना
एसे काम करता हूँ
ऐसे मैं अपने शहीदों का सम्मान करता हूँ

Monday, 16 June 2025

।। एसे ही होते हैं ।।

सुबह क्या और सांझ क्या
सूरज का नमन उनको
नही देखते बाट छांव की
तुलसी भाई
कलाकार एसे ही होते है

कभी इस राह कभी उस राह
क्या करना मिट्टी का घरोंदा
पेड़ों के साये में सोते है
मन्मोजी जोगि एसे ही होते हैं

खुस्बू से है जीवन उनका
क्या रिस्ता फूलों का उनसे
कभी इस फूल, कभी उस फूल
फिरते हैं गुलशन - गुलशन
भवरे तो एसे ही होते हैं

चांद देखेंगे
मैं अपने घर से
तुम अपने घर से
भीग लेते हैं
सावन की बारिश मैं
रूहानी इश्क है परकट जी
आशिक एसे ही होते हैं

कोई पास भी नही बैठने देता
रूह इन्सान से अंजान है
हाथ मिला लो एक बार ए दोस्त
अजनबी एसे ही होते हैं

दिल में जगह बनाये रखना
याद करोगे तो आ जायेंगे
फासले होंगे दर्मियां पर
दूर कभी ना जायेंगे
साले आते रहते है
खयालों में
दोस्त एसे ही होते हैं

कवि - तुलसी राम प्रजापति

Monday, 2 June 2025

wood sculpture

This wooden sculpture is my ode to the window-side embrace of a rainy day. It's about the intoxicating scent of wet earth—that mitti ki khushboo—filling the air, punctuated by the percussive plash of water from the roof. It celebrates the vibrant spectacle of flowers bursting into bloom, the silent descent of leaves pirouetting from branches, and the invisible currents of wind carrying the melodies of birdsong., 

Friday, 2 May 2025

छोटी-छोटी बातों में होती हैं बड़ी बाते

जब बढ़ जाती है बेचैनी, सुकून पास नहीं रहता तो मिटटी याद आती है
अपनों से दूर होते हैं, तो मिटटी याद आती हैं तो मिटटी के घरोंने याद आते हैं,  तो मिटटी के खिलोने याद आते हैं 
श्री खाटू श्याम व सालासर बाला जी घूमने गए, तो रतनगढ़ से हमारी रेल थी तो रतनगढ़ भी घूमने का मौका भी मिला जो की मेरे लिए शोभाग्य की बात थी यहाँ की पुरानी ईमारातें वाकई देखने लायक हैं!
इन्हे इतनी बारीकी से तराशा गया था पर अब ये खंडहर हो चुकी हैं अक्सर लोग यहाँ घूमने नहीं आते वहां के लोकल लोगों का कहना था यहाँ घूमने को कुछ नहीं हैं पर इतनी खूबसूरत ईमारतें देखकर मैं हैरान था वही की कुछ तशवीरें ली जो बहुत खूबसूरत हैं जितना देखा उतना तो फोटो में दिखाना असंभव हैं 

Monday, 28 April 2025

chhoti chhoti baatain


"Overjoyed to share that my terracotta sculpture, 'Chhoti Chhoti Batain', is now on display at the prestigious AUM The Global Art Centre in Mumbai!

I would like to extend my heartfelt gratitude to Mr. Narendra Borlepwar, whose tireless efforts and unwavering support have made my dream a reality. Thank you, sir, for believing in me.

"'Chhoti Chhoti Batain' is a poignant terracotta sculpture that celebrates the simplicity and beauty of village life. Crafted from the precious medium of terracotta, this piece embodies the warmth and earthiness of our rural heritage.

Terracotta, a medium that has been used for centuries, holds a special significance in our cultural narrative. It represents the earthy, handmade, and sustainable aspects of our traditional crafts. In an era dominated by machine-made and mass-produced goods, terracotta reminds us of the value of human touch and the beauty of imperfections.

This sculpture is also a reflection of our times, where we are rapidly forgetting our traditional values and ways of life. We are losing touch with the land, our roots, and our community. 'Chhoti Chhoti Batain' is a reminder to appreciate the little things, to respect the land that gives us life, and to cherish the traditions that make us who we are.

The village, with its lush fields, rustic homes, and vibrant community, is a symbol of our collective heritage. It represents a way of life that is simple, sustainable, and meaningful. As we increasingly urbanize and globalize, we must not forget the lessons of the village – lessons of hard work, resilience, and community.

Through 'Chhoti Chhoti Batain', I invite you to reflect on the beauty of our rural heritage and the importance of preserving our traditional values. Let us cherish the little things, appreciate the beauty of imperfections, and stay connected to our roots.

Monday, 24 March 2025

प्रकृति

हमारी भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं, मेरी कलाकृति एक संदेश देती है - प्रकृति के साथ जुड़ने की महत्ता। गाँव की जीवनशैली, जहां चूल्हे पर खाना बनता है, खेतों से ताज़ा हवा आती है, पेड़-पौधे, कच्चे रास्ते, नदी किनारे, खेतों की मेड़, और चौपाल पर कहानियों का दौर - यह सब हमें प्रकृति के करीब ले जाता है। लेकिन आज, शहरों की भागदौड़ गाँव की तरफ बढ़ रही है, और हमें यह याद रखना होगा कि प्रकृति के साथ जुड़ना हमारे जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है।

मेरी कलाकृति एक पुकार है - प्रकृति की ओर लौट चलने की, अपनी जड़ों को याद करने की, और जीवन की सच्ची सुंदरता को महसूस करने की। यह एक आमंत्रण है - प्रकृति के साथ जुड़ने का, अपने आप को शांति और सुकून से भरने का, और जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने का।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति हमारी माँ है, और हमें उसकी देखभाल करनी चाहिए। हमें अपने जीवन में प्रकृति के साथ जुड़ने के लिए समय निकालना चाहिए, और उसकी सुंदरता को महसूस करना चाहिए। मेरी कलाकृति इसी संदेश को देती है - प्रकृति के साथ जुड़ने की, और जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देखने की।

Saturday, 15 March 2025

पेड़ होते थे कभी

पेड़ होते थे कभी, हम फल तोड़कर खाया करते थे, 

क्या हम बच्चों को विस्वास दिला पाएंगे

खुशबू आती थी मिट्टी से, मिट्टी भी जाहरीली ना थी 

क्या वो समझ पाएंगे 

ऐसे फर्राटे से चलती थी गाड़िया नाना नानी के यहां मिनटों में पहुच जाते थे

 कैसे यकि दिलाएंगे

ये पंखे अपने आप घूमते थे कभी, जादू की संदूक में बर्फ जम जाया करती थी 

कैसे समझा पाएंगे

पानी में डूबकर मर जाते थे, इतना पानी होता था कभी, कुए, झरने, पोखर, ये सब बस किताबों में रह जायेंगे, 

तशवीरों में रह जायेंगे, 

झुका के डाल को  तोड़ लेना  फल

झुका के डाल को  तोड़ लेना  फल 

इन शाखों को कभी न काटना 

इन पर पंछी बैठते हैं

रोज़ मंदिर की एक सीडी चढ़ा देता है वो मुझे वो
थोडा सा दुलार देकर ही सही

कुछ सुखी टहनियां सर्दी में जलाने से भी दुआ मिलेंगी
अच्छा हो चार दोस्तों को बुलावा  देना

कभी रोते को हँसा दिया किसी को रास्ता  बता  दिया इस बार इबादत कुछ ऐसे ही सही

इन ईंटों को थोडा धो लेना घर बनाने से पहले 

यहाँ लोग गर्म हवाओं से बचने को बैठते हैं


Friday, 14 March 2025

उसूलों की लड़ाई में

पंख कुतर के पिंजरों में बिठा रखा है 
लहू लोहान होना पड़ता है 
आसमानों की लड़ाई में 

महल चौबारे ढह गए केवल खंडर रह गए  
घर पीछे रह जाते हैं उसूलों ली लड़ाई में 

किनारे पर बिठा रखा है चलने भी नही देते 
बेकसूर मारे जाते हैं बेलों की लड़ाई में 

कच्ची खाने वाले भी रोटी सेक लेते है 
सियासत के गर्म चूल्हे पर 
अक्सर भूखा रहना पड़ता है उसूलों की लड़ाई में 

ऐ वादे सारे सब झूठी बाते हैं 
बस मीठी बातें है
झूठ के जंगल में सच को
हमेशा अकेला रहना पड़ता है वज़ूदों की लड़ाई में

about work

शीर्षक - (अंग्रेस्टिक फील्ड) Agrestic field

जब मैं अपने हाथों के बीच मिट्टी को आकार देता हूं, तो मुझे अपनी नसों में बहने वाली समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की याद आती है। मेरा नाम तुलसी राम है, और मैं भारत के एक छोटे से गाँव का एक विनम्र कलाकार हूँ। पीढ़ियों से, मेरा परिवार टेराकोटा की उपयोग में आने वाली कृतियाँ बनाता आ रहा है जो ग्रामीण जीवन की सुंदरता और सादगी को दर्शाती हैं। मेरी यह मूर्ति प्यार का श्रम है, जिसे सटीकता और भक्ति के साथ गढ़ा गया है। मूर्ति कला में उपयोग की गई हर आकृति को सिद्दत के साथ बनाया गया है 

"एग्रीस्टिक फील्ड" एक मार्मिक टेराकोटा मूर्तिकला है जो ग्रामीण भारत के देहाती आकर्षण का सार प्रस्तुत करती है। "एग्रीस्टिक" शब्द ग्रामीण इलाकों या ग्रामीण क्षेत्रों को संदर्भित करता है, और यह मूर्तिकला भूमि और उसके लोगों की भावना को दर्शाता है। सटीकता और भक्ति के साथ तैयार की गई, "एग्रीस्टिक फील्ड" दर्शकों को लुढ़कती पहाड़ियों, हरे-भरे खेतों और जीवंत ग्रामीण जीवन के शांत परिदृश्य में ले जाती है। मूर्तिकला के मिट्टी के रंग और बनावट प्राकृतिक दुनिया के साथ गर्मजोशी और जुड़ाव की भावना पैदा करते हैं, जो दर्शकों को एग्रीस्टिक क्षेत्र की शांत दुनिया में कदम रखने के लिए आमंत्रित करते हैं।