Wednesday, 31 December 2025
10 आओ की ऐसे आदमी को ढूंढ़ते
Wednesday, 24 December 2025
9 नई तस्वीरें
Friday, 17 October 2025
7 आसान नहीं हैँ ऊंचे नीचे रास्तों पर 181025
Monday, 29 September 2025
8 दोहरी जिंदगी
Friday, 5 September 2025
5. खिड़की अपने आप में एक मुकम्मल जहाँ होती है
6. सफर में
गुम हैं सब अपने ही मोबाइल की दुनिया में,
बाहर का नज़ारा, अब किसको भाता है?
दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।
वो हरी-भरी वादियाँ, वो उड़ते पंछी,
बस चलती है ट्रेन और गुज़रती है ज़िंदगी।
दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।
Tuesday, 2 September 2025
4. माटी
3. आपके आने की खुशी
Monday, 1 September 2025
2. ये जो रास्ते हैं
1. वजह तुम्हे चाहने की
Friday, 29 August 2025
सफर की धूल
Friday, 22 August 2025
सफर की धुल ( चन्दन बन गई )
सफ़र की धूल (चंदन बन गई)
तुलसी राम जी द्वारा रचित, 'सफ़र की धूल (चंदन बन गई)' एक ऐसा काव्य संग्रह है जो हमें जीवन की यथार्थवादी और भावुक यात्रा पर ले जाता है। यह किताब हमें बताती है कि कैसे जीवन के उतार-चढ़ाव, संघर्ष, और कड़वे अनुभव हमें अंत में एक बेहतर और परिपक्व इंसान बनाते हैं। लेखक ने अपनी कविताओं में यह दर्शाया है कि जिस तरह धूल भरे रास्ते पर चलते हुए हम थक जाते हैं, उसी तरह जीवन की कठिनाइयां भी हमें थका देती हैं, लेकिन अगर हम धैर्य रखें और आगे बढ़ते रहें, तो वही संघर्ष हमारे व्यक्तित्व को निखारता है और हमें चंदन की तरह सुगंधित बना देता है। यह संग्रह सिर्फ़ व्यक्तिगत भावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्यार और रिश्तों की जटिलताओं को भी गहराई से छूता है। यह बताता है कि रिश्ते कितने नाज़ुक होते हैं और उन्हें कैसे संभालना चाहिए। साथ ही, यह संग्रह समाज में हो रहे बदलावों, मानवीय मूल्यों में आ रही गिरावट, और आधुनिकता की अंधी दौड़ पर भी एक तीखी टिप्पणी करता है। कुल मिलाकर, तुलसी राम जी की यह किताब हमें जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती है और सिखाती है कि हर मुश्किल के बाद मिलने वाला अनुभव हमें और मज़बूत बनाता है, ठीक वैसे ही जैसे धूल का सफ़र चंदन में बदल जाता है।
खंजर में जहर लगाकर मारना
खंजर में जहर लगाकर मारना
कहीं मैं जिंदा ना रह जाऊं
हर शख्स को हक है मुझे मारने का
हर कातिल को ये समझा दो
कहीं मैं जिंदा ना रह जाऊं
अगर हो सका सांसों को रोक लूंगा मैं
कहीं जिंदा ना रह जाऊं
जला दो मेरे अरमानों को
हर ख्वाहिश को दफना दो
कहीं किसी आरजू के लिए
मैं जिन्दा ना रह जाऊं
जाने कहां है वो खोई-खोई
खुश रहने की आदत
खुश रहने की आदत यूं ही नहीं है हमें मैंने इसकी गम के आंसुओं से कीमत चुकाई है बदनाम हुआ हर पत्थर आकर मुझे लगा हर पत्थर से ठोकर खाई है आशिक के नाम से मशहूर आज ये शोहरत मैंने यूं ही ना पाई है खुश रहने की आदत यूं ही नहीं है इसकी गम के आंसुओं से कीमत चुकाई है तुमसे जुदा होकर कितनी बार मौत को गले लगाया है जाने क्यों मौत से बड़ी है ये जुदाई है खुश रहने की आदत यूं ही हहज नहीं है हमें इसकी गम के आंसू मत चुकाए हैं
हालात को दोष दूँ या इस जिंदगी को
Thursday, 21 August 2025
है तिनके की भी अहमियत
कया कभी सोचा है तुमने
क्या कभी सोचा है तुमने
सोचता हूं कभी-कभी चहेकते हैं पंछी
या कोई राग सिखाते हैं
हम क्यों नहीं समझ पाते इनको
इस छत से उस छत उड़ते फिरते हैं
इनकी सुबह कितनी सुंदर होती है
भोर का सूरज भी देखो कितना सुंदर होता है
मुस्कुरा रहा हो जैसे
बादल भी रंग बदलते हैं
हमारी नजरों पर जाने कैसी धुंध सी छाई है
जो हटती नहीं हम कितना अनदेखा करते हैं
सुबह कितनी सुंदर होती है
ऐसे समझ ना पाओगे इनको
सुनने समझने से पहले खुद से बातें करते फिर सुनते हैं पंछीयों का चहकना
सूरज से बातें करते हैं
प्रकृति हर सुबह क्लास लेती है
पर बहुत लोग बंक पर होते हैं
यह कक्षा कितनी सुंदर होती है
सुबह कितनी सुंदर होती है
जितना देखो उतनी सुंदर होती है
पहरन और उतरन में फर्क होता है
बेजान शाख से पत्ते गिर जाते हैं
चाह कर भी छूता नहीं हूं फूलों को
शराब
11. इमारतें देख कर सजदा करते हो
दुआओं में असर होता है
ए खुदा तेरी रौशनी से घर नही जलते
ए खुदा तेरी रौशनी से घर नही जलते
फिर क्यों तेरे बन्दे हाथों में राख लिये फिरते हैं
वक्त कभी रहता नही एकसा
आसमा में चमकते हैं जो तारे
अखिर तो जमी पर गिरते हैं
फिर क्यों तेरे बन्दे *ज़मीं* पर लड़ते फिरते हैं
आया ही नही जीने का सलिका
गलती किससे कहां क्या हो गई
यही गिनाया करते है
क्यों तेरे बन्दे एसा करते है
ए खुदा तेरी रौशनी से घर नही जलते
फिर क्यों तेरे बन्दे हाथों में राख लिये फिरते हैं
इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
कुदरत में भी नही ये इतने रंग बदलते हैं
ये कितने डंग बदलते हैं
जाने कब अकेले रह जाऔ ये पल में संग बदलते हैं
इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
ये कितने डंग बदलते हैं
ये कितने रंग बदलते हैं
इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
कभी न सोचा होगा किसी ने
बोलो क्या बाकी रह गया
अब तो अंग बदलते हैं
इन्सांनों सी फितरत खुदा किसी को ना दे
ये कितने रंग बदलते हैं
ये कितने डंग बदलते हैं
परियां
सचमुच की परियों के पंख नही होते
पर एसे ही हस्ती है दिल को छू जाती हैं
स्वपन की दुनिया का एहसास कराती हैं
सचमुच की परियों के पंख नही होते
पर एसी हि होती हैं
जब तेरी तस्वीर बनाऊगा मैं
तो शायद पंख लगाऊंगा मैं
दूर हि रहती है और खुब सताती हैं
जब तेरी तशवीर बनाऊंगा में तो शायद पंख लगाऊंगा
मां मुझे दुनिया में आने दो
कहने को तो तन्हा है पर हैं नही
घिरे हैं अपने ही ताने बानों में
कहने को तो तन्हां हैं पर हैं नही
वो बातें भी किसी ओर की करते है
घिरे हैं भीड़ में अपने पर हैं नही
रात गुजार दी मियां
थोड़ा सा और खोज लो
शायद कुछ मिल जाये वहम है
कुछ है नही
उड़ना सिख रहे हैं
हवाओं से कह दो अपनी ओकात मैं रहें
हमारे चिराग अब तूफान मैं जलना सीख रहे हैं
आसमान से कह दो अपना कद और ऊँचा कर ले
हमारे पंछी अब उड़ना सीख रहे हैं
उन चाँद सितारों से भी कह दो बढ़ा लें रौशनी अपनी
हमारे तारे भी अब चमकना सीख रहे हैं
ओंधे मुह गिरोगे अब तो सरहद पर दुसमन से कह दो
मेरे देश के बच्चे तिरंगे को लहराना सीख रहे हैं
लिखने को हो जाएँ तैयार कलमकारों से कह दो
हजारों हाथ दुनिया को मुट्टी में भरना सीख रहे हैं
शिक्षा तभी होगी ये साक्षर जाकर हर नजर से कह दो हम माँ,
बहन और बेटी की इज्जत करना सीख रहे हैं
कवि - तुलसी राम प्रजापति
Kahani MEWAT KI
ये कहानी मेवात के एक छोटे से गांव नीमका से सुरु होती है
गांव का नाम ही नीमका था वहां नीम के पेड़ कम ही होंगे कीकर थी चारों ओर ये कीकर भी बहुत सुंदर लगती थी हरि भरी इससे ज्यादा हरयाली कभी देखी भी न थी गांव के बाहर ही एक स्कूल था हम स्कूल तख्ती, सलेटी ओर स्याही लेकर जाते थे कभी कभी
सरकण्डे की कलम बनाते थे
बहुत मजा आता था स्कूल बंक करने में
ठीक्कर (मट्के का छोटा सा टुकडा) से फिरक्नी बनाते थे दीवारों पर घिस घिस कर।।
गांव का माहौल कुछ ऐसा हो गया कि
फिर हम शहर आ गये मुझे ऐसा लगता है जब तक गांव में हम थे वो गांव तभी तक सुंदर था हमारे शहर आने के बाद गांव जैसे उजाड़ सा हो गया
हरे भरे कीकर के पेड़ भी जैसे सूख ही गये
मेरे दादा जी का आस पास तो क्या दूर तक नाम था उनका नाम था ग्यासी राम प्रजापति
मेरे पिताजी जी वे ज्यादा पढ़े लिखें नहीं थे पर उन्होंने अपने जीवन में चुनौतीयों का सामना किया आजकल हम कॉलेज एवम अन्य संस्थानों से कसम सीखते है उन्होंने अपने जीवन में जो भी कार्य किये अपने अनुभव से किये उन्होंने जीवन यापन के लिए जो कार्य किये सबसे पहला काम जो उन्हें आसान लगा ठंडी कुल्फीयां बेचने का काम किया, और स्वम ही कुल्फीयां खाकर बीमार हो गए और वह काम छोड़ दिया, फिर अपने कुछ मित्रों के साथ दिल्ली आये और कपडे सिलने का काम किया, इस काम में भी उनका मन नहीं लगा तो, फरीदाबाद आकर रिक्शा चलाया इस काम से भी वे जल्दी समझ गए कुछ होने वाला नहीं है उनके सपने बड़े थे पर रास्ते का पता नहीं था फिर अपने गांव आकर अपने पिताजी जी के साथ मिलकर मिट्टी के बर्तन बनाने सुरु किये पर गांव में उन बर्तनो का सही भाव नहीं मिलता था तो इन्होने लकड़ी के समान बनाने सुरु किये जैसे बेलन, मूसल, लट्टू, हुक्का, आदि लकड़ी से बनाये गए समान को बहुत पसंद किया गया, कई साल यही काम किया!
गांव से हम बच्चों का भविष्य सुधारने पिताजी जी शहर आ गए क्योंकि हमारे गांव में अब डकैत पैदा हो रहे थे लोग नोकरी ओर खेती बाड़ी में कम ओर डकैती में ज्यादा थे शहर आकर पापा जी ने कच्ची मिट्टी का छान वाला घर बनाया और मिट्टी के बरतन बनाने का काम किया
डायरी
डायरी में एक कोरा पन्ना छोड देना
वक्त लिख देगा दास्ताँ तेरी मेरी
सुरु किया है जो सफ़र राह में ना छोड देना
नही आता मुझे एक खुबसूरत मोड देकर छोड देना
दूर ही रहना भाता नही मुझे तेरा मायूस होना
और करीब ले आता है तेरा नज़र अंदाज़ कर देना
पुछे जो कोई मुझसे
इबादत की तरह मैं तुम्हे क्यों चाहता हुँ
यूँ खुदा का सुक्र अदा करना चाहता हूँ
थोडा वक्त दो, कुछ बाते करो
कुछ मै सुनू कुछ मेरी सुनो
जितना तुम जानोगे मुझको
उतना करीब आओगे
सोचा न था कोई ऐसे भी जिन्दगी में आयेगा जिसके दूर जाने से आँखे नम ओर दिल वीरान हो जायेगा
क्यूँ बेकरार है उसके लिये
जिसे तेरे करार से कोई सरोकार नही
नफरत जगह बना लेती है
जहां ऐतबार नही
कल का क्या
जी ले इस पल को
कल किसी को तुमसे प्यार हो न हो
।।जब प्यार हो जिन्दगी में तो मिट्टी से खुस्बू आती है रन्ज में तो फूल भी महकना छोड देते है ।।
Reasons why you should NEVER marry an Artist:
1. They are moody like a pregnant woman.
2. They are super boring. They can spend whole day just looking at a leaf.
3. You can’t beat them in surprises. They are more creative than you can imagine.
4. They may look simple but their head is as complex as rocket science.
5. If you are a clean freak, be ready for divorce.
6. They are man/woman of few words. 2/3rd of their life, they remain silent.
7. They stay in their own imaginary world, hard to bring back to normal world.
8. You can’t seduce them easily; they know anatomy better than you.
9. They spent half of their life in the studio.
10. If they are dedicated artist, you will be their second love. First is ART
चांद को मुट्ठी में भरना है
सोच लिया है तो छु भी लेंगे
अब आस्माँ दूर नही मेरे पैरों से
तुमसे मिलकर करना हह्ता हुँ बहुत सी बाते पर मुझे यकिन है जब कभी मिलोगी तो कहने को कुछ न होगा बस तुम्हे नीहारेंगी मेरी आँखे और बुझा लेंगी अपनी बर्षों की प्यास मेरी बात तुम तक पहुंच जायेगी *जाना* खामोश रहकर भी।
Tuesday, 19 August 2025
दिल के जवाँ रखने से
दिल के जवाँ रखने से तक्दीरें बदल जाती हैं
दोस्त हो साथ में तो तस्वीरें बदल जाती हैं
हर पल जियो ओर ऐसे जियो के पल आखरी है
जाने ना दो बचपन को खिल्खिलओ, बच्चे हो जाओ
मुस्कुराने से भी हाथों की लकीरें बदल जाती है
ज़िंदादिल रहो, बिखेर दो खुशियां दोनो हाथों से
रोते बिलख्ते होटों पर मुस्कान जब आती है
सच कहता हुँ खुदा के भी फैसले बदल जाती है
प्यार में डूबे खत
खीच लाती थी जो तेरी ओर
वो रूहानी सी खुशबू आज भी है
तेरे दिये हुए स्कार्फ में
काजल को स्याही बनाकर
लिखे होंगे उसने वो खत
जब भी पढता हुँ कुछ नया ही पाता हुँ
प्यार में डूबे खत कभी पुराने नही होते
बन्द आंखों से भी महसूस कर लेता हूँ
तेरे पास होने के अहसास को
सदियों से फूल ही है प्यार की निशानी
फ्रेम वही रहता है तस्वीरें बदल जाती हैं
महोब्बत में तोहफे कभी पुराने नही होते
तुमसे हूँ, तुम्हरा ही रहूँगा सदा
जब जी चाहे आजमा लेना
ऊम्र की आंच पर रिस्तों को सेक लो
बिना विशवास के रिश्ते श्याने नही होते
जब भी पढता हुँ कुछ नया ही पाता हुँ
प्यार में डूबे खत कभी पुराने नही होते
गीत, गजल सब फीके लगते हैँ
चाहो तो मुहोब्बत शब्द हटा कर देख लो
कुछ भी लिख लो, कैसे भी लिख लो
बिना प्यार के मिश्रे सुहाने नही होते
जब भी पढता हुँ कुछ नया ही पाता हुँ
प्यार में दुबे खत कभी पुराने नही होते
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ
सर झुकाता हूँ सजदे में
खुद पर गुमान करता हूँ
अदब से हर काम करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ
चल रहा हूँ मशाल लेकर
चिरागों को रौशन करने का काम करता हूँ
मुझे कोई पहचानता नही पर
हाथ जोड़कर नमस्कार करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ
बनाता हूँ रास्ते नये पर
नक्शेकदमों पर उनके ही चलता हूँ
जिसमे धूल है उनके चरणों की
उस मिट्टी को नमन करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ
हार न माने कभी भी जिन्दगी में
जीने का हुनर सिखाता हूँ
देखता रहूँ मैं रोज़ आईना
ऐसे काम करता हूँ
ऐसे मैं अपने शिक्षकों का सम्मान करता हूँ
जब कभी आप हमे याद आओगे
जब कभी आप हमे याद आओगे
थोडा सा तो आप भी मुस्कुराओगे
मन ही मन व्याकुल से हो जाओगे
महफिल में होगी कभी जब चर्चा
कभी खुशी के गीत गाएंगे
तन्हाई करेगी जब पागल
तो आप हमे याद आओगे
रौशन किये हैं दिये आपने
बहुत से दीप जलाए
जगमग होगा जहान जिस दिन
तो आप हमे याद आओगे
फूलों के साथ होते हैं कांटे
दिये के साथ अन्धेरा होता है
लहरों के साथ टकराके
डगमगायेगी जब कस्ती हमारी
तो आप हमे याद आओगे
जब कभी आप हमे याद आओगे
थोडा सा तो आप भी मुस्कुराओगे
ना हो सिक्वा किसी से किसी को
ऐसा मुमकिन नही
हमे भी है
आपके पंखो से उड़ेगा जब कोई
तो आप हमें याद आओगे
जब कभी आप हमे याद आओगे
थोडा सा तो आप भी मुस्कुराओगे
तेरी हर अदा पर कविता बन जाये
कहना है बहुत कुछ
कैसे कहुँ *जाना*
कैसे मैं तारीफ करुँ
तुम हो मेरी कल्पना
तुम सुबह हो, तुम शाम हो
तेरी कितनी तारीफ करुँ
मैं कवि तू कविता बन जाये
तेरी हर बात पर कविता बन जाये
इनायत बहुत है तेरे पास
पर तू जानता नही
तू मेरे चहरे का नूर है
तू मेरा गुरुर है
तेरी कितनी मैं तारीफ करुँ
मैं कवि तू कविता बन जाये
CCC
जिन्दा हुँ मैं तू मेरी रूह है
जुदा ना होना कभी
जिन्दा हो, जिन्दा ही रहना
वाज़िब है उनका पागल कहना
वो इतना ही जानते हैं
पर तेरी मैं तारीफ करुँ
कि मैं कवि तू कविता बन जाये
तेरी हर बात पर कविता बन जाये
कहानी पत्ते की (किसी डाल का पत्ता था)
किसी डाल का पत्ता था
मैं टूटने से पहले
अब जमीं का हो गया हूँ
मैं मिटा नहीं हूँ टूट कर
हर साख का हो गया हूँ
ले गया हवा का एक झोंका
मुझे मेरे घर से उड़ा के
अब मैं जहाँ का हो गया हूँ
मिट्टी का एक टुकड़ा था मैं
कुछ बनने से पहले
अब विचार किसी कलाकार
का हो गया हूँ
न था मैं परिंदा आस्मा का
पर खूब उड़ा
मिटती नहीं है हस्ती
किसी का होने से
पा लिया है अपने आप को
अब खुद का हो गया हूँ
सफ़र है जिंदगी मुसाफिर हैं हम सब
चलते चलते अब मैं राह सा हो गया हूँ
चैन से सो जाओ अब तो यारो
अब मैं तुम सा हो गया हूँ
मुस्कुराते रहना
मायूसी भागेगी धूप नही लगने दूँगा
सुबह से थोडी छांव उधारी हि सही
सांझ तक बस मुस्कुराते रहना
नादान हुँ मैं नादनियां करता हुँ
माफ करके मेरी नादानीयों पर
ठहाके लगाते रहना
मंज़िल की ओर चले है अभी तो
रोकेंगे लोग तुम्हे रुकना ना बढ़ते रहना
लोग चाहें जैसा चश्में वैसे ही
लगाते रहना
Saturday, 16 August 2025
वक्त बदल जाते हैँ
Thursday, 14 August 2025
ऐसे मैं शहीदों का सम्मान करता हूँ
सर झुकता हूं सजदे में
अदब से हर काम करता
ऐसे मैं शहीदों का सम्मान करता हूँ
चल रहा हूँ मशाल लेकर
चिरागों को रौशन करने का काम करता हूँ
शहादत की उनको याद दिलाया करता हूं
ऐसे मैं शहीदों का सम्मान करता हूँ
बनाता हूँ रास्ते नये पर
नक्शेकदमों पर उनके ही चलता हूँ
जिसमे धूल है उनके चरणों की
उस मिट्टी को नमन करता हूँ
ऐसे मैं अपने शहीदों सम्मान करता हूँ
हार न माने कभी भी जिन्दगी में
जीने का हुनर सिखाता हूँ
देखता रहूँ मैं रोज़ आइना
एसे काम करता हूँ
ऐसे मैं अपने शहीदों का सम्मान करता हूँ
Monday, 16 June 2025
।। एसे ही होते हैं ।।
सुबह क्या और सांझ क्या
सूरज का नमन उनको
नही देखते बाट छांव की
तुलसी भाई
कलाकार एसे ही होते है
कभी इस राह कभी उस राह
क्या करना मिट्टी का घरोंदा
पेड़ों के साये में सोते है
मन्मोजी जोगि एसे ही होते हैं
खुस्बू से है जीवन उनका
क्या रिस्ता फूलों का उनसे
कभी इस फूल, कभी उस फूल
फिरते हैं गुलशन - गुलशन
भवरे तो एसे ही होते हैं
चांद देखेंगे
मैं अपने घर से
तुम अपने घर से
भीग लेते हैं
सावन की बारिश मैं
रूहानी इश्क है परकट जी
आशिक एसे ही होते हैं
कोई पास भी नही बैठने देता
रूह इन्सान से अंजान है
हाथ मिला लो एक बार ए दोस्त
अजनबी एसे ही होते हैं
दिल में जगह बनाये रखना
याद करोगे तो आ जायेंगे
फासले होंगे दर्मियां पर
दूर कभी ना जायेंगे
साले आते रहते है
खयालों में
दोस्त एसे ही होते हैं
कवि - तुलसी राम प्रजापति
Monday, 2 June 2025
wood sculpture
Friday, 2 May 2025
छोटी-छोटी बातों में होती हैं बड़ी बाते
Monday, 28 April 2025
chhoti chhoti baatain
Monday, 24 March 2025
प्रकृति
Saturday, 15 March 2025
पेड़ होते थे कभी
पेड़ होते थे कभी, हम फल तोड़कर खाया करते थे,
क्या हम बच्चों को विस्वास दिला पाएंगे
खुशबू आती थी मिट्टी से, मिट्टी भी जाहरीली ना थी
क्या वो समझ पाएंगे
ऐसे फर्राटे से चलती थी गाड़िया नाना नानी के यहां मिनटों में पहुच जाते थे
कैसे यकि दिलाएंगे
ये पंखे अपने आप घूमते थे कभी, जादू की संदूक में बर्फ जम जाया करती थी
कैसे समझा पाएंगे
पानी में डूबकर मर जाते थे, इतना पानी होता था कभी, कुए, झरने, पोखर, ये सब बस किताबों में रह जायेंगे,
तशवीरों में रह जायेंगे,
झुका के डाल को तोड़ लेना फल
झुका के डाल को तोड़ लेना फल
इन शाखों को कभी न काटना
इन पर पंछी बैठते हैं
रोज़ मंदिर की एक सीडी चढ़ा देता है वो मुझे वो
थोडा सा दुलार देकर ही सही
कुछ सुखी टहनियां सर्दी में जलाने से भी दुआ मिलेंगी
अच्छा हो चार दोस्तों को बुलावा देना
कभी रोते को हँसा दिया किसी को रास्ता बता दिया इस बार इबादत कुछ ऐसे ही सही
इन ईंटों को थोडा धो लेना घर बनाने से पहले
यहाँ लोग गर्म हवाओं से बचने को बैठते हैं
Friday, 14 March 2025
उसूलों की लड़ाई में
about work
शीर्षक - (अंग्रेस्टिक फील्ड) Agrestic field
जब मैं अपने हाथों के बीच मिट्टी को आकार देता हूं, तो मुझे अपनी नसों में बहने वाली समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की याद आती है। मेरा नाम तुलसी राम है, और मैं भारत के एक छोटे से गाँव का एक विनम्र कलाकार हूँ। पीढ़ियों से, मेरा परिवार टेराकोटा की उपयोग में आने वाली कृतियाँ बनाता आ रहा है जो ग्रामीण जीवन की सुंदरता और सादगी को दर्शाती हैं। मेरी यह मूर्ति प्यार का श्रम है, जिसे सटीकता और भक्ति के साथ गढ़ा गया है। मूर्ति कला में उपयोग की गई हर आकृति को सिद्दत के साथ बनाया गया है
"एग्रीस्टिक फील्ड" एक मार्मिक टेराकोटा मूर्तिकला है जो ग्रामीण भारत के देहाती आकर्षण का सार प्रस्तुत करती है। "एग्रीस्टिक" शब्द ग्रामीण इलाकों या ग्रामीण क्षेत्रों को संदर्भित करता है, और यह मूर्तिकला भूमि और उसके लोगों की भावना को दर्शाता है। सटीकता और भक्ति के साथ तैयार की गई, "एग्रीस्टिक फील्ड" दर्शकों को लुढ़कती पहाड़ियों, हरे-भरे खेतों और जीवंत ग्रामीण जीवन के शांत परिदृश्य में ले जाती है। मूर्तिकला के मिट्टी के रंग और बनावट प्राकृतिक दुनिया के साथ गर्मजोशी और जुड़ाव की भावना पैदा करते हैं, जो दर्शकों को एग्रीस्टिक क्षेत्र की शांत दुनिया में कदम रखने के लिए आमंत्रित करते हैं।