खुली छत पर लेटा हूँ
तारों के ऊपर तारे दिख रहे हैं
शुक्र है तारे दिख रहे हैं
में खुश हुँ
बादल भी आजाद दिख रहे हैं
नही लगी है इन पर कोई धारा
अभी तक
मेरी आजादी इन मच्छरों ने छीन रखी है
में भी रहना चाहता हूँ आज़ाद
बादलों की तरह
अब कौन देखता है तारों को
चमकते हुए
फ़ोन की चमक हावी है
हमारे विचारों पर
अब ये फ़ोन सोचने भी नही देता
आज़ादी छीन ली है हमारी चंद गवारों ने
चलो एक आवाज़ उठाते हैं
फ़ोन खिलाफत आंदोलन चलाते हैं
झुटमूट का नाटक करते हैं
जैसे एक पेड़ के साथ सौ फ़ोटो खिंचाते हैं
Wednesday, 21 August 2019
खुली छत पर
Friday, 12 April 2019
आज मैं अपने आप को ढूँढने निकल पडा
आज मैं अपने आप को ढूँढने निकल पडा
गलियों से होते हुए, खेतों में खलिहानो में
जैसे निकलता है भूखा कोई काम की तलाश में
किसान भी लगा है पसीने से तर बतर
कुछ शब्द चुभे हुए है उसके सीने में
कुछ जमीन में धसे जा रहे है वजूद की तलाश में
मेरे शब्द बिखरे पडे है, चारों ओर
कुछ शब्द आलस में सोये है पेड़ की छांव में
और कर रहे है बातें बडी बडी
ये बेघर हो गये हैं आज घर की तलाश में
कुछ चोरि के शब्द बना रहे है सलाह
इज्जत से रोटी खाने की
बाहर आकर ये केसे हो गये
पराये हो गये हैं शायद अपनो की तलाश में
Monday, 8 April 2019
घर बनाने वाले कभी घरों में नही रहते
न पूछो ये कैसे हो गया
जिसने जमीन का सीना चीर कर फसल उगाई
वो ही आज खाली पेट सो गया
न पुछो कैसे ये हो गया
धागा धागा जोड़ जिसने कपडों की थान बनाई
वो ही आज ठंड में सिकुडकर सो गया
न पूछो ये कैसे हो गया
घर बनाकर देखो एक मिस्त्री
सडक किनारे सो गया
न पूछो ये कैसे हो गया
वो वीर जिनकी सुरक्षा में
देश चैन से सो गया
उनकी भी सुरक्षा पर सवाल हो गया
न पूछो ये कैसे हो गया
बूंद बूंद से समुंदर भरते देखा
आज कैसे एक समुंदर बूंद हो गया
तुलसी राम 8,4,2019