Friday, 22 August 2025

जाने कहां है वो खोई-खोई

जाने कहां है वो खोई-खोई 
जिसकी आंखों में अधूरा सपना है कोई सपनों से डर सा लगता है फिर भी सपनों में है खोई 
रहती है वह घर में लेकिन जाने कहां है खोई 
जिसकी मुस्कान को है अखियां तरसी जिसकी अंखियां अश्कों से बरसी 
लगता है जैसी यह रोई-रोई 
जाने कहां है खोई खोई 
कर दूँ इसका हर सपना पूरा 
ना रहे कोई, ख्वाब अधूरा 
मेरे मन की उदासी जाए 
होठों पर इसकी मुस्कान जो आए 
आरजू है मेरी यहीं इस को दुख ना आए कोई फिर ना रहे ये कभी खोई-खोई 

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