Sunday, 27 March 2022

बोल हाल जो मैंने पूछा था ख्यालो में

हाल जो मैंने पूछा था ख्यालों में
चारो तरफ धुंद से छाने लगे
मेरे बोल पलटकर आने लगे

रुकने को कहा मैंने कुछ देर
जिसने भी दस्तक दी
चले गए थे जो पंछी
खाने की चाह में
अब  लौटकर घर आने लगे

चंद लब्ज

ख्याल उनका आया और मैंने पलटकर देखा भी
हवाओं में एक धीमी धीमी सी खुशबू थी
शायद उन्हें भी मेरा ख़याल आया होगा

बच्चे तो मासूम होते हैं

चले जाते हैं कही भी
खिलोनों की तलाश में
छोटी सी मजील की तलाश में
इन्हें नही है पहचान
अंधेरों उजालों की
बच्चे तो मासुम होते हैं

लडखडाते कदमों को जरूरत है
उँगली थामने की
जल जाता है इनका बचपन
शब्दों के ताप से भी
नही जानते ये बचने  का हुनर
बच्चे तो मासुम होते हैं

तेल थोडा कम भी हो
मेरे घर के चिराग में
तो गम नही 
बूंद-बूंद ही सही
हर घर का चिराग रौशन होना चाहिये

अभी तो ये जानते ही नही
रौशनी के मायने

रौशनी बहुत है
इन चिरागों में
थोडी चिंगारी लगा कर तो देखो
एक अनजान नींद में सोये हैं ये सब
इन्हें हौले से जगा कर तो देखो
बच्चे हैं ये बच्चे
बच्चे तो मासुम होते हैं

तुमसे दूर जाने के बाद

बेकरारी बढ्ने लगी है
तुमसे दूर जाने के बाद
हवा गुम्ं है मौसम भी रुखा रुखा है
कोई सुकून दिल को सहलाता नही
धड़कने बढ्ने लगी हैं
तुमसे दूर जाने के बाद

तन झुटा पर मन सच्चा है
खुबसूरती के मायने बदलने लगे हैं
मन भारी, आँखे बोझल सी हैं
हरफ़ों में, आयतों में, तेरा नाम देखते हैं
तुमसे दूर जाने के बाद

कैसे कोई इतना सता सकता है
रातों में जगा सकता है
जिन्दगी कुछ भी नही है
जाना तुमसे दूर जाने के बाद