सुबह क्या और सांझ क्या
सूरज का नमन उनको
नही देखते बाट छांव की
तुलसी भाई
कलाकार एसे ही होते है
कभी इस राह कभी उस राह
क्या करना मिट्टी का घरोंदा
पेड़ों के साये में सोते है
मन्मोजी जोगि एसे ही होते हैं
खुस्बू से है जीवन उनका
क्या रिस्ता फूलों का उनसे
कभी इस फूल, कभी उस फूल
फिरते हैं गुलशन - गुलशन
भवरे तो एसे ही होते हैं
चांद देखेंगे
मैं अपने घर से
तुम अपने घर से
भीग लेते हैं
सावन की बारिश मैं
रूहानी इश्क है परकट जी
आशिक एसे ही होते हैं
कोई पास भी नही बैठने देता
रूह इन्सान से अंजान है
हाथ मिला लो एक बार ए दोस्त
अजनबी एसे ही होते हैं
दिल में जगह बनाये रखना
याद करोगे तो आ जायेंगे
फासले होंगे दर्मियां पर
दूर कभी ना जायेंगे
साले आते रहते है
खयालों में
दोस्त एसे ही होते हैं
कवि - तुलसी राम प्रजापति