Saturday, 15 March 2025

पेड़ होते थे कभी

पेड़ होते थे कभी, हम फल तोड़कर खाया करते थे, 

क्या हम बच्चों को विस्वास दिला पाएंगे

खुशबू आती थी मिट्टी से, मिट्टी भी जाहरीली ना थी 

क्या वो समझ पाएंगे 

ऐसे फर्राटे से चलती थी गाड़िया नाना नानी के यहां मिनटों में पहुच जाते थे

 कैसे यकि दिलाएंगे

ये पंखे अपने आप घूमते थे कभी, जादू की संदूक में बर्फ जम जाया करती थी 

कैसे समझा पाएंगे

पानी में डूबकर मर जाते थे, इतना पानी होता था कभी, कुए, झरने, पोखर, ये सब बस किताबों में रह जायेंगे, 

तशवीरों में रह जायेंगे, 

No comments:

Post a Comment