Wednesday, 14 December 2022

मुस्कुराने का कोई बहाना ढूंढ ले

ढाप दे गमों को खुशी के रेत से
जिंदगी है चोटी और रास्ता है लंबा 
भीड़ में हजारों की खुद को ढूंढ ले 
मुस्कुराने का कोई बहाना ढूंढ ले 

डूबते को तिनके का सहारा 
और भूखे की मुस्कुराहट है रोटी
चल उठ कोई दाना  ढूंढ ले
मुस्कुराने का कोई बहाना ढूंढ ले 

दुनिया को कहने दो पागल 
कभी कबार खुद पर हंसना भी जरूरी है
खुद से बातें करना भी जरूरी है 
ढूंढ ले चल मुस्कुराने का कोई बहाना ढूंढ ले 

न जा यूं मायूस होकर किसी को जरूरत है तुम्हारी
लहरें हैं सागर में तो किनारा ढूंढ ले
चल मुस्कुराने का कोई बहाना ढूंढ ले 

करता जा तू मेहनत हर दम 
न डरना आंधियों के शोर से 
कभी तो बरसेगी बरकत 
किसी दरख़्त की छांव ढूंढ ले
 चल मुस्कुराने का कोई बहाना ढूंढ ले 

सवार दिया बचपन किसी का तो जी ले जिंदगी
बस बहुत हुआ रोना पोंछ के आंसू
खुशी का कोई तराना ढूंढ ले 
मुस्कुराने का कोई बहाना ढूंढ ले 





Friday, 9 September 2022

biography

 Tulsi ram prjapati  born in Fatidabad, Haryana India in 12 November 1982. Presently living and working  in Chandigarh, india.
He is graduate from Delhi College of Art and complete Masters from  Jamia Milia Islamiya. Now Working in terracotta.
The medium that is terracotta is fascinating in itself. The artist childhood has been spent playing in clay and since childhood he learned to make clay from the game by playing on the wheel.  Today these wheel designs are the main part of his sculptures which look very attractive.
He used cement along terracotta in his sculptures.
The stone sculptures made by him also attract people across the world.
तुलसीराम प्रजापति, एक ऐसा नाम जिसकी कहानी मिट्टी की सौंधी खुशबू में रची-बसी है। हरियाणा के फरीदाबाद में 12 नवंबर 1982 को जन्मे तुलसीराम का बचपन अभावों से भरा था, लेकिन उनके हाथ में जादू था। गांव की गलियों में खेलते हुए, मिट्टी से उनका रिश्ता कुछ ऐसा जुड़ा कि वह उनकी पहचान बन गया। मिट्टी के घरौंदे बनाते-बनाते उन्होंने कब चाक चलाना सीख लिया, यह उन्हें भी याद नहीं। वह खेल-खेल में मिट्टी को आकार देते और उसमें अपनी कल्पना के रंग भरते थे।
यही खेल धीरे-धीरे उनका जुनून बन गया। उन्होंने अपनी इस कला को और निखारने का फैसला किया। दिल्ली के कॉलेज ऑफ आर्ट से उन्होंने स्नातक की डिग्री ली और फिर जामिया मिलिया इस्लामिया से मास्टर डिग्री प्राप्त की। यह सफर आसान नहीं था, लेकिन उनकी लगन और मेहनत ने हर मुश्किल को पार कर दिया।
आज, तुलसीराम एक जाने-माने कलाकार हैं, जो टेराकोटा की दुनिया में अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। उनकी मूर्तियां सिर्फ मिट्टी से बनी कलाकृतियां नहीं हैं, बल्कि उनके बचपन के खेल और चाक पर बिताए गए पलों का अद्भुत संगम हैं। वह अपनी कला में टेराकोटा के साथ सीमेंट का भी प्रयोग करते हैं, जिससे उनकी कृतियों में एक नई जान आ जाती है।
सिर्फ टेराकोटा ही नहीं, उनकी पत्थर की मूर्तियां भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। उनकी कला देश की सीमाओं को पार कर चुकी है और दुनियाभर में लोग उनकी कृतियों की सराहना करते हैं। तुलसीराम प्रजापति की कहानी हमें यह सिखाती है कि अगर हम अपने सपनों का पीछा करें, तो मिट्टी भी सोना बन सकती है।

सुखलाल जी

मेरा नाम  सुखलाल प्रजापति है  मेरा जन्म 5 अक्टूबर 1955 को मेवात के नीमका गांव मैं हुआ। मेरे पिता जी का नाम स्वर्गीय श्री ग्यासी राम प्रजापति एवम माता का नाम स्वर्गीय  श्री मंगो देवी है  मेरे पिता जी मिट्टी के बर्तनों के मशहूर कारीगर थे। मैंने अपने पिता से मिट्टी का कार्य सीखा। मेरे परिवार में मेरी पत्नी श्री ओम बती, दो बेटे और एक बेटी है मेरी पत्नी भी मेरे साथ शिल्प का कार्य करती है। वह टैराकोटा शिल्प की कुशल कारीगर है।
मेरे बेटे भी टैराकोटा का कार्य करते हैं।  और बेटी मेरे द्वारा बनाए गए pots पर वरली पेंटिंग करती है।

 गांव में मिट्टी ले बर्तनों के खरीददार कम थे तो मैं  1985 में काम करने फरीदाबाद आ गया । मैंने  मिट्टी के बर्तनों में भी कई तरह की नई तकनीक विकसित की जैसे बिजली से चलने वाला चाक, मूर्ति बनाने के सांचे, बर्तनों को पकाने के लिए भट्टी, मिट्टी को छानकर उसकी, अशुद्धियां दूर करना। मेरा शिल्पकार बनने का सफर आसान नहीं था बहुत  कठिनाइयों का सामना करते हुए मैने काम करने की बारीकियों को सीखा एवं परिवार के अन्य सदस्यों को भी यह काम सिखाया। मैने 100 से अधिक लोगों को मिट्टी का कार्य सिखाया है और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है। मुझे पहली बार 1990 में सूरजकुंड क्राफ्ट मेले में अपनी मिट्टी की कृतियों को दिखाने का अवसर मिला। और तभी से मैं भारत के विभिन्न कोनों में कला की प्रदर्शनी कर रहा हूं। कई  बार  मुझे राज्य सरकारों  द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। 2003 मैं मुझे पहली बार टैराकोटा के कार्य पर राज्य पुरस्कार मिला  एवम 2011 में मुझे दुबारा राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया और  2011में ही मुझे  राष्ट्रीय मैरिट सर्टिफिकेट से भी सम्मानित किया गया जो की बहुत गर्व की बात है। मैंने जिन अंतर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनीयों में भाग लिया है उनमें से मुख्य हैं सूरजकुंड क्राफ्ट मेला, दिल्ली हाट, शिल्पारामम हैदराबाद, भारत भवन भोपाल, कला ग्राम उदयपुर आदि  एवम भारत के अन्य शिल्प बाजारों में भाग लिया है। मैंने  टैराकोटा की प्रदर्शनी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुबई एवं जापान का भ्रमण किया है। भारतीय टैराकोटा शिल्पकला के विकास के लिए निरंतर कार्य रहा हूं।

Sunday, 27 March 2022

बोल हाल जो मैंने पूछा था ख्यालो में

हाल जो मैंने पूछा था ख्यालों में
चारो तरफ धुंद से छाने लगे
मेरे बोल पलटकर आने लगे

रुकने को कहा मैंने कुछ देर
जिसने भी दस्तक दी
चले गए थे जो पंछी
खाने की चाह में
अब  लौटकर घर आने लगे

चंद लब्ज

ख्याल उनका आया और मैंने पलटकर देखा भी
हवाओं में एक धीमी धीमी सी खुशबू थी
शायद उन्हें भी मेरा ख़याल आया होगा

बच्चे तो मासूम होते हैं

चले जाते हैं कही भी
खिलोनों की तलाश में
छोटी सी मजील की तलाश में
इन्हें नही है पहचान
अंधेरों उजालों की
बच्चे तो मासुम होते हैं

लडखडाते कदमों को जरूरत है
उँगली थामने की
जल जाता है इनका बचपन
शब्दों के ताप से भी
नही जानते ये बचने  का हुनर
बच्चे तो मासुम होते हैं

तेल थोडा कम भी हो
मेरे घर के चिराग में
तो गम नही 
बूंद-बूंद ही सही
हर घर का चिराग रौशन होना चाहिये

अभी तो ये जानते ही नही
रौशनी के मायने

रौशनी बहुत है
इन चिरागों में
थोडी चिंगारी लगा कर तो देखो
एक अनजान नींद में सोये हैं ये सब
इन्हें हौले से जगा कर तो देखो
बच्चे हैं ये बच्चे
बच्चे तो मासुम होते हैं

तुमसे दूर जाने के बाद

बेकरारी बढ्ने लगी है
तुमसे दूर जाने के बाद
हवा गुम्ं है मौसम भी रुखा रुखा है
कोई सुकून दिल को सहलाता नही
धड़कने बढ्ने लगी हैं
तुमसे दूर जाने के बाद

तन झुटा पर मन सच्चा है
खुबसूरती के मायने बदलने लगे हैं
मन भारी, आँखे बोझल सी हैं
हरफ़ों में, आयतों में, तेरा नाम देखते हैं
तुमसे दूर जाने के बाद

कैसे कोई इतना सता सकता है
रातों में जगा सकता है
जिन्दगी कुछ भी नही है
जाना तुमसे दूर जाने के बाद