Thursday, 21 August 2025

चाह कर भी छूता नहीं हूं फूलों को

चाह कर भी छूता नहीं हूं फूलों को 
रंग कोई लगाता नहीं हूं 
मैंने देखा है छुईमुई को शरमाते हुए 
छू लूं तो गुनाह हो जाए 
खुबसूरती की क्या बात करें 
कहां से इतने गुलाब लाएं वह सजता सवारता इतना है 
हम आईना हो जाए तो गुना हो जाए जिसने भी देखो जमाने की बात करता है शहर न देखा,  घर न देखा, 
हर आंगन में रोशनी 
हर छत पर चांद है 
अपनी ही बात हो तो गुनाह हो जाए 
मैंने सुना है उसने आंचल में छुपा रखे हैँ सितारे
 सितारों का अपना ही नूर है 
ऐसे में आंखें भी बंद कर लूं तो गुनाह हो जाए

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