Monday, 29 September 2025

8 दोहरी जिंदगी

कभी कभी लागता है ऐसे 
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी 
कहाँ गई मेरी जिंदगी 
क्या सब जी रहे हैं 
दोहरी जिंदगी 
जी रहा हुँ पिता की जिंदगी 
जी रहा हुँ पति की जंदगी 
कहा है मेरी जिंदगी 
कभी कभी लगता है ऐसे 
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी 
हत्या कर दि मैंने कुछ किरदारों की 
वक्त ने कुछ को मार दिया 
​सुबह उठूँ तो फर्ज पुकारे,
शाम ढले तो जिम्मेदारी।
हर साँस में कर्तव्य भरा है,
खुद के लिए न कोई तैयारी।
​कभी कभी लगता है ऐसे
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी
क्या सभी जीते हैं 
दोहरी जिंदगी 

Friday, 5 September 2025

5. खिड़की अपने आप में एक मुकम्मल जहाँ होती है

खिड़की अपने आप में 
एक मुकम्मल जहाँ होती है 
दूकानदार दिन भर बैठे रहते है 
ग्राहक की चाह में 
और बूढ़ी आंखे भी टिकी रहती हैं 
खिड़की पर बाट देखते हुऐ 
बचपन गुजर जाता है 
खिड़की पर लटकते हुऐ 

खिड़की अपने आप में 
एक मुकम्मल जहाँ होती है 
खिड़की से ही मिलती सारी सहूलियतें 
खाने की चीजें, पीने की चीजें, टिकट सिनेमा हॉल की
खिड़की से ही देखा था मैंने उसको 
और खिड़की पर ही छोड़ दिया 

खिड़की अपने आप में 
एक मुकम्मल जहाँ होती है 
अब तो सबके हाथों में हैं
अपनी अपनी खिड़कियां 
और झाँकते रहते है पूरी दुनियां में 
एक दूसरे की दुनिया में 




6. सफर में

सफर में दिखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ 
सब खोये हैं अपनी ही दुनिया में
खिड़की के बाहर से  नजारे चीख चीखकर बुला रहे हैं इन्हे 
कुछ सोये हुऐ हैं गहरी नींद में 
सफर में दीखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ 
बेलगाड़ी भी दिख जाती हैं अभी सन 2025 में
और दिख जाते हैं कुछ खेत लहराते हुऐ भी 
पर सफर में दीखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ 

गुम हैं सब अपने ही मोबाइल की दुनिया में,

बाहर का नज़ारा, अब किसको भाता है?

दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।

​वो हरी-भरी वादियाँ, वो उड़ते पंछी,

बस चलती है ट्रेन और गुज़रती है ज़िंदगी।

दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।



Tuesday, 2 September 2025

4. माटी

​माटी मुझमें मैं माटी में खो जाता हूँ,
माटी मेरी मैं माटी का हो जाता हूँ।
आकार बदलता हूँ,
विचार बदलता हूँ,
मैं माटी के रंग बदलता हूँ,
मैं माटी के संग बदलता हूँ।
खुशबू लेता हूँ माटी की,
माटी को खुशबू देता हूँ,
माटी मेरी मैं माटी का हो जाता हूँ।

​कभी छुप जाता हूँ मैं माटी में,
कभी माटी से पहचान बनता हूँ,
माटी को शान बनता हूँ,
माटी को जान बनता हूँ,
माटी मेरी मैं माटी का हो जाता हूँ

कभी बारिश की बूँदें बनकर 
कभी नया बीज बनकर 
मैं अंकुरित हो जाता हूँ 
एक नया जीवन पाता हूँ
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ

कभी धूप की तपिश में जलकर,
कभी हवा के संग बहकर,
हर कण में समा जाता हूँ,
हर रूप में नया जीवन पाता हूँ,
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ।

कभी एक वृक्ष की जड़ बनकर,
कभी फलों का स्वाद बनकर,
जीवन का सार बन जाता हूँ,
माटी को हर बार पूजता हूँ,
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ।
हाँ, मैं इंसान हूँ माटी का,

और मेरी पहचान है माटी से,
मैं जीता हूँ माटी में,
और अंत में माटी में मिल जाता हूँ,
माटी मेरी और मैं माटी का हो जाता हूँ।

मेरी उंगलियों के पोरों में, माटी ख़्वाब बुनती है,
मैं मौन रहता हूँ, पर माटी सब कुछ सुनती है।
मैं इसे सिर्फ सानता नहीं, इसमें रूह भरता हूँ,
पुरानी जड़ों से जुड़कर, नए प्रयोग करता हूँ।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​कभी टेढ़े-मेढ़े कोनों में आधुनिकता तलाशता हूँ,
कभी मिट्टी के सीने पर भविष्य को तराशता हूँ।
मेरे औज़ार जब मिट्टी को सहलाते हैं,
कंक्रीट के जंगलों में भी, नए अक्स उभर आते हैं।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​वो जो कहते हैं कि मिट्टी पुरानी बात है,
उन्हें क्या पता, इसमें हर युग की नई शुरुआत है।
मैं अमूर्त (Abstract) को आकार देता हूँ,
मिट्टी के बिखराव को एक विचार देता हूँ।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​कभी इसे आग में तपाकर 'टेराकोटा' सा सख़्त करता हूँ,
कभी इसके कच्चेपन में ही अपना सारा वक़्त भरता हूँ।
मेरी प्रदर्शनी में सजी मूर्तियाँ, सिर्फ मिट्टी का ढेर नहीं,
मेरी आत्मा के टुकड़े हैं, इनमें कोई फेर नहीं।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।
​मैं कलाकार हूँ, मैं परिवर्तन का राही हूँ,
माटी की इस आधुनिक गाथा का मैं ही गवाही हूँ।
मैं रूप बदलता हूँ, मैं काल बदलता हूँ,
मैं माटी के संग, खुद को हर पल बदलता हूँ।
माटी मेरी, मैं माटी का हो जाता हूँ।

3. आपके आने की खुशी

आपके आने की खुशी में घर महक उठा,
जैसे वीराने में कोई फूल खिल उठा।
अंधेरी रातों में चाँदनी बिखर गई,
पतझड़ में जैसे बहार आ गई।
हर कोना खुशी से झूम उठा,
हर दीवार पर रौनक आ गई।
जैसे पूजा की थाली में दीप जल उठा,
आपके आने की खुशी में घर महक उठा।

अब सूनापन कहीं नहीं ठहरता,
हर तरफ बस आपका ही जिक्र है।
इस दिल में भी एक रोशनी हुई,
किसी का अब कोई नहीं डर है।
आपके कदम पड़े तो साँसों में इत्र घ

Monday, 1 September 2025

2. ​ये जो रास्ते हैं

​ये जो रास्ते हैं,
इन पर कभी हम अकेले चले थे।
धूप थी, छाँव थी,
हर कदम एक नया जज्बा था।
​उम्मीदें थी कुछ,
कुछ सपने थे टूटे।
उलझनें थी बहुत,
कुछ अपने थे छूटे।
​उन काँटों से मिले,
जो राहों में बिछे थे।
पर उन्हीं से सीखकर,
हम कुछ तो आगे बढ़े थे।
​आज जब पीछे मुड़कर देखा,
वही रस्ते याद आए।
जिन पर हम गिरे थे,
और फिर से उठकर चले थे।
​यकीन ही नहीं होता,
वही धूल, वही राह।
कब हमारे लिए
चंदन बन गई,
कब इस दिल को
शांति दे गई।

1. वजह तुम्हे चाहने की

ऐ फूल जो मेरे 
जीवन को महका रहे हैं
तुम ही हो वजह इन्हे चाहने की 

ऐ हवा के झोंके जो मेरे 
मेरे बालों को सहला रहे हैं 
तुम ही हो वजह इन्हे चाहने की 

ऐ बारिश की खुशबू और मिट्टी के रंग 
जो मुझे भा रहे हैं 
तुम ही हो वजह इन्हे चाहने की 

ऐ धूप की किरणें जो मुझ पर
मेरे चेहरे पर हँसी ला रहे हैं
तुम ही हो वजह इन्हें चाहने की

​ऐ रात, ऐ चाँदनी जो मेरे
मेरे ख्वाबों को सजा रहे हैं 
तुम ही हो वजह इसे चाहने की

​ऐ चाँद, तारे जो मेरे
रास्तों को दिखा रहे हैं
तुम ही हो वजह इन्हें चाहने की

​ऐ मीठी सी मुस्कान जो मेरे
मेरे होंठों पर ठहरी है 
और हटती ही नहीं 
तुम ही हो वजह इसे चाहने की