Thursday, 21 August 2025

Kahani MEWAT KI

ये कहानी मेवात के एक छोटे से गांव नीमका से सुरु होती है
गांव का नाम ही नीमका था वहां नीम के पेड़ कम ही होंगे  कीकर थी चारों ओर ये कीकर भी बहुत सुंदर लगती थी हरि भरी इससे ज्यादा हरयाली कभी देखी भी न थी गांव के बाहर ही एक स्कूल था  हम स्कूल तख्ती, सलेटी ओर स्याही लेकर जाते थे कभी कभी
सरकण्डे की कलम बनाते थे
बहुत मजा आता था स्कूल बंक करने में
ठीक्कर (मट्के का छोटा सा टुकडा) से फिरक्नी बनाते थे दीवारों पर घिस घिस कर।।

गांव का माहौल कुछ ऐसा हो गया कि
फिर हम शहर आ गये मुझे ऐसा लगता है जब तक गांव में हम थे वो गांव तभी तक सुंदर था  हमारे शहर आने के बाद गांव जैसे उजाड़ सा  हो गया
हरे भरे कीकर के पेड़ भी जैसे सूख ही गये


मेरे दादा जी का आस पास तो क्या दूर तक नाम था उनका नाम था ग्यासी राम प्रजापति 

मेरे पिताजी जी वे ज्यादा पढ़े लिखें नहीं थे पर उन्होंने अपने जीवन में चुनौतीयों का सामना किया आजकल हम कॉलेज एवम अन्य संस्थानों से कसम सीखते है उन्होंने अपने जीवन में जो भी कार्य किये अपने अनुभव से किये उन्होंने जीवन यापन के लिए जो कार्य किये सबसे पहला काम जो उन्हें आसान लगा ठंडी कुल्फीयां बेचने का काम किया, और स्वम ही कुल्फीयां खाकर बीमार हो गए और वह काम छोड़ दिया, फिर अपने कुछ मित्रों के साथ दिल्ली आये और कपडे सिलने का काम किया, इस काम में भी उनका मन नहीं लगा तो, फरीदाबाद आकर रिक्शा चलाया इस काम से भी वे जल्दी समझ गए कुछ होने वाला नहीं है उनके सपने बड़े थे पर रास्ते का पता नहीं था फिर अपने गांव आकर अपने पिताजी जी के साथ मिलकर मिट्टी के बर्तन बनाने सुरु किये पर गांव में उन बर्तनो का सही भाव नहीं मिलता था तो इन्होने लकड़ी के समान बनाने सुरु किये जैसे बेलन, मूसल, लट्टू, हुक्का, आदि लकड़ी से बनाये गए समान को बहुत पसंद किया गया, कई साल यही काम किया!

 गांव से हम बच्चों का भविष्य सुधारने पिताजी जी शहर आ गए क्योंकि हमारे गांव में अब डकैत पैदा हो रहे थे लोग नोकरी ओर खेती बाड़ी में कम ओर डकैती में ज्यादा थे शहर आकर पापा जी ने कच्ची मिट्टी का छान वाला  घर बनाया और मिट्टी के बरतन बनाने का काम किया 

No comments:

Post a Comment