सब खोये हैं अपनी ही दुनिया में
खिड़की के बाहर से नजारे चीख चीखकर बुला रहे हैं इन्हे
कुछ सोये हुऐ हैं गहरी नींद में
सफर में दीखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ
बेलगाड़ी भी दिख जाती हैं अभी सन 2025 में
और दिख जाते हैं कुछ खेत लहराते हुऐ भी
पर सफर में दीखते है बहुत काम लोग खिड़की से बाहर झाँकते हुऐ
गुम हैं सब अपने ही मोबाइल की दुनिया में,
बाहर का नज़ारा, अब किसको भाता है?
दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।
वो हरी-भरी वादियाँ, वो उड़ते पंछी,
बस चलती है ट्रेन और गुज़रती है ज़िंदगी।
दिखते हैं बहुत कम लोग, खिड़की से बाहर झाँकते हुए।
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