इमारतें देख कर सजदा करते हो,
चलते-फिरते इंसान तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
रंग के अलावा तुम्हें कुछ और दिखता क्यों नहीं?
रोना-धोना, चीखना-चिल्लाना,
हँसते-मुस्कुराते चेहरे तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
पत्थरों की चमक पर जान देते हो,
अंदर के अंधेरे तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
महंगे लिबासों की बात करते हो,
बदन के ये जख्म तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
अपनी अपनी दीवारें ऊँची कर लीं,
गिरती हुई दीवारें तुम्हें दिखती क्यों नहीं?
दूसरों के आँसुओं को पानी समझते हो,
अपनी आँखों के जाले तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
दुनिया को बदलने की बात करते हो,
खुद के ये बदलते रूप तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
इमारतों के शौकीन हो, ठीक है,
मगर उजड़ते हुए घर तुम्हें दिखते क्यों नहीं?
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