Monday, 1 September 2025

2. ​ये जो रास्ते हैं

​ये जो रास्ते हैं,
इन पर कभी हम अकेले चले थे।
धूप थी, छाँव थी,
हर कदम एक नया जज्बा था।
​उम्मीदें थी कुछ,
कुछ सपने थे टूटे।
उलझनें थी बहुत,
कुछ अपने थे छूटे।
​उन काँटों से मिले,
जो राहों में बिछे थे।
पर उन्हीं से सीखकर,
हम कुछ तो आगे बढ़े थे।
​आज जब पीछे मुड़कर देखा,
वही रस्ते याद आए।
जिन पर हम गिरे थे,
और फिर से उठकर चले थे।
​यकीन ही नहीं होता,
वही धूल, वही राह।
कब हमारे लिए
चंदन बन गई,
कब इस दिल को
शांति दे गई।

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