जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी
कहाँ गई मेरी जिंदगी
क्या सब जी रहे हैं
दोहरी जिंदगी
जी रहा हुँ पिता की जिंदगी
जी रहा हुँ पति की जंदगी
कहा है मेरी जिंदगी
कभी कभी लगता है ऐसे
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी
हत्या कर दि मैंने कुछ किरदारों की
वक्त ने कुछ को मार दिया
सुबह उठूँ तो फर्ज पुकारे,
शाम ढले तो जिम्मेदारी।
हर साँस में कर्तव्य भरा है,
खुद के लिए न कोई तैयारी।
कभी कभी लगता है ऐसे
जी रहा हुँ दोहरी जिंदगी
क्या सभी जीते हैं
दोहरी जिंदगी
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