और हम राहगीर
चल रहे हैं
धूप में भी कभी छाँव में
दिन में भी कभी रात मे
फान रहे हैं सफर की धूल
एक सफर है जिंदगी
और हम राहगीर
ऊँचे भी हैं रास्ते कुछ निचे भी
टेढ़े भी है रास्ते कुछ सीधे भी
ना चाहते हुऐ भी
चल रहे हैं और
फांक रहे हैं सफर की धूल
इन्ही राश्तों पर चले थे वे लोग
फूलों पर भी चले थे
और काँटों पर भी चले थे
जो बना गए रास्ते हमारे लिए
जाने कब सफऱ की धूल
चन्दन बन गई
सबको कहाँ नसीब है
सफर की धूल
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