Friday, 29 August 2025

सफर की धूल

एक सफर है जिंदगी  
और हम राहगीर 
चल रहे हैं 
धूप में भी कभी छाँव में 
दिन में भी कभी रात मे
फान रहे हैं सफर की धूल 

एक सफर है जिंदगी  
और हम राहगीर 
ऊँचे भी हैं रास्ते कुछ निचे भी 
टेढ़े भी है रास्ते कुछ सीधे भी 
ना चाहते हुऐ भी 
चल रहे हैं और
फांक रहे हैं सफर की धूल 

इन्ही राश्तों पर चले थे वे लोग 
फूलों पर भी चले थे 
और काँटों पर भी चले थे
जो बना गए रास्ते हमारे लिए 
जाने कब सफऱ की धूल 
चन्दन बन गई 
सबको कहाँ नसीब है 
सफर की धूल 







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