Tuesday, 19 August 2025

कहानी पत्ते की (किसी डाल का पत्ता था)

किसी डाल का पत्ता था
मैं टूटने से पहले
अब जमीं का हो गया हूँ

मैं मिटा नहीं हूँ टूट कर
हर साख का हो गया हूँ
ले गया हवा का एक झोंका
मुझे मेरे घर से उड़ा के
अब मैं जहाँ का हो गया हूँ

मिट्टी का एक टुकड़ा था मैं
कुछ बनने से पहले
अब विचार किसी कलाकार
का हो गया हूँ

न था मैं परिंदा आस्मा का
पर खूब उड़ा
मिटती नहीं है हस्ती
किसी का होने से
पा लिया है अपने आप को
अब खुद का हो गया हूँ

सफ़र है जिंदगी मुसाफिर हैं हम सब
चलते चलते अब मैं राह सा हो गया हूँ
चैन से सो जाओ अब तो यारो
अब मैं तुम सा हो गया हूँ

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