मेरे बेटे भी टैराकोटा का कार्य करते हैं। और बेटी मेरे द्वारा बनाए गए pots पर वरली पेंटिंग करती है।
गांव में मिट्टी ले बर्तनों के खरीददार कम थे तो मैं 1985 में काम करने फरीदाबाद आ गया । मैंने मिट्टी के बर्तनों में भी कई तरह की नई तकनीक विकसित की जैसे बिजली से चलने वाला चाक, मूर्ति बनाने के सांचे, बर्तनों को पकाने के लिए भट्टी, मिट्टी को छानकर उसकी, अशुद्धियां दूर करना। मेरा शिल्पकार बनने का सफर आसान नहीं था बहुत कठिनाइयों का सामना करते हुए मैने काम करने की बारीकियों को सीखा एवं परिवार के अन्य सदस्यों को भी यह काम सिखाया। मैने 100 से अधिक लोगों को मिट्टी का कार्य सिखाया है और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है। मुझे पहली बार 1990 में सूरजकुंड क्राफ्ट मेले में अपनी मिट्टी की कृतियों को दिखाने का अवसर मिला। और तभी से मैं भारत के विभिन्न कोनों में कला की प्रदर्शनी कर रहा हूं। कई बार मुझे राज्य सरकारों द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। 2003 मैं मुझे पहली बार टैराकोटा के कार्य पर राज्य पुरस्कार मिला एवम 2011 में मुझे दुबारा राज्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया और 2011में ही मुझे राष्ट्रीय मैरिट सर्टिफिकेट से भी सम्मानित किया गया जो की बहुत गर्व की बात है। मैंने जिन अंतर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनीयों में भाग लिया है उनमें से मुख्य हैं सूरजकुंड क्राफ्ट मेला, दिल्ली हाट, शिल्पारामम हैदराबाद, भारत भवन भोपाल, कला ग्राम उदयपुर आदि एवम भारत के अन्य शिल्प बाजारों में भाग लिया है। मैंने टैराकोटा की प्रदर्शनी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुबई एवं जापान का भ्रमण किया है। भारतीय टैराकोटा शिल्पकला के विकास के लिए निरंतर कार्य रहा हूं।
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