चले जाते हैं कही भी
खिलोनों की तलाश में
छोटी सी मजील की तलाश में
इन्हें नही है पहचान
अंधेरों उजालों की
बच्चे तो मासुम होते हैं
लडखडाते कदमों को जरूरत है
उँगली थामने की
जल जाता है इनका बचपन
शब्दों के ताप से भी
नही जानते ये बचने का हुनर
बच्चे तो मासुम होते हैं
तेल थोडा कम भी हो
मेरे घर के चिराग में
तो गम नही
बूंद-बूंद ही सही
हर घर का चिराग रौशन होना चाहिये
अभी तो ये जानते ही नही
रौशनी के मायने
रौशनी बहुत है
इन चिरागों में
थोडी चिंगारी लगा कर तो देखो
एक अनजान नींद में सोये हैं ये सब
इन्हें हौले से जगा कर तो देखो
बच्चे हैं ये बच्चे
बच्चे तो मासुम होते हैं
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