Friday, 12 April 2019

आज मैं अपने आप को ढूँढने निकल पडा

आज मैं अपने आप को  ढूँढने निकल पडा
गलियों से होते हुए, खेतों में खलिहानो में
जैसे निकलता है भूखा कोई काम की तलाश में

किसान भी लगा है पसीने से तर बतर
कुछ शब्द चुभे हुए है उसके सीने में
कुछ जमीन में धसे जा रहे है वजूद की तलाश में

मेरे शब्द बिखरे पडे है, चारों ओर
कुछ शब्द आलस में सोये है पेड़ की छांव में
और कर रहे है बातें बडी बडी
ये बेघर हो गये हैं आज घर की तलाश में

कुछ चोरि के शब्द बना रहे है सलाह
इज्जत से रोटी खाने की
बाहर आकर ये केसे हो गये
पराये हो गये हैं शायद अपनो की तलाश में

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