खुली छत पर लेटा हूँ
तारों के ऊपर तारे दिख रहे हैं
शुक्र है तारे दिख रहे हैं
में खुश हुँ
बादल भी आजाद दिख रहे हैं
नही लगी है इन पर कोई धारा
अभी तक
मेरी आजादी इन मच्छरों ने छीन रखी है
में भी रहना चाहता हूँ आज़ाद
बादलों की तरह
अब कौन देखता है तारों को
चमकते हुए
फ़ोन की चमक हावी है
हमारे विचारों पर
अब ये फ़ोन सोचने भी नही देता
आज़ादी छीन ली है हमारी चंद गवारों ने
चलो एक आवाज़ उठाते हैं
फ़ोन खिलाफत आंदोलन चलाते हैं
झुटमूट का नाटक करते हैं
जैसे एक पेड़ के साथ सौ फ़ोटो खिंचाते हैं
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